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Tuesday, March 8, 2011

'स्रवंति' का उत्तरआधुनिकता विशेषांक'



                                              'स्रवंति' का उत्तरआधुनिकता विशेषांक लोकार्पित'

मैं ‘स्रवंति’ का विशेष रूप से इसलिए आभारी हूँ कि इस पत्रिका के ‘उत्तर आधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ विशेषांक के माध्यम से उत्तर आधुनिकता के कन्सेप्ट से परिचित हो पाया। यह सही है कि अब भी इस विमर्श को पूरी तरह समझने में विद्वान ही समर्थ नहीं हो पाये हैं, जैसा कि इस पत्रिका में लिखे लेखों से पता चलता है; तो हम क्या पूरी तरह समझ सकेंगे!


‘स्रवंति’ का फरवरी अंक विशेषांक के रूप में आना एक सुखद आश्चर्य रहा। इस अंक के सम्पादकीय में विषय की रूपरेखा और स्वरूप की जानकारी मिलती है जो उत्तर आधुनिकता जैसे पेचीदा विषय की भूमिका के रूप में पाठक की सहायक बनती है।प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अपने लेख ‘उत्तर आधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ में विषय प्रवेश करते हुए बताया है कि "उत्तर आधुनिकता ने उन समूहों को केंद्र में लाने का प्रयास किया है जो परिधि पर थे - इसे हाशियाकृत की सार्वजनीन स्वीकृति के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श और आदिवासी विमर्श जैसी प्रवृत्तियों के उभार की व्याख्या इस दृष्टि से की जानी आवश्यक है।"

प्रो. दिलीप सिंह अपने लेख ‘उत्तर-आधुनिक विमर्श: एक बहस’ में यह स्पष्ट करते हैं कि सारा यूरोप, विशेष कर फ़्रांस और रूस, जिन्हें उत्तरआधुनिक विमर्श के केंद्र में रखा जाता है, आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता को दो भिन्न काल खंड में विभाजित चिंतन या परिस्थितियाँ नहीं मानते। वे बताते हैं कि "भारतेंदु और द्विवेदी युग में स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, दलितोद्धार के जो स्वर साहित्य में मुखरित हैं वे तत्कालीन समाज को निश्चित ही तब उत्तर-आधुनिक विमर्श लगे हों तो कोई अचरज नहीं।"

          ‘उत्तर आधुनिक विमर्श’ की सैद्धांतिकी के कुछ प्रधान तत्व तथा प्रवृत्तियों पर चर्चा करते हुए अर्जुन चौहान कहते हैं कि "बनाना तथा बिगाड़ना, बसाना तथा उजाड़ना, विकास तथा विनाश ये सब उत्तराधुनिकता की प्रवृत्तियां हैं।... उत्तराधुनिक विमर्श वैध-अवैध या नैतिक-अनैतिक को कोई स्थान नहीं देता।"

प्रो. एम. वेकटेश्वर अपने लेख ‘उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ में बताते हैं कि "उत्तरआधुनिकता उस विश्वव्यापी आधुनिकता के प्रति एक प्रतिक्रिया है जो सामान्यतः प्रत्यक्षवादी प्रौद्योगिकी प्रधान एवं तार्किक मानी जाती है।" उन्होंने देरिदा, ल्योतार, मिशेल फ़ूको, डॉ. सुधीश पचौरी, मनोहर श्याम जोशी जैसे कई विद्वानों को उद्धृत किया है और निष्कर्ष निकाला है कि "उत्तर आधुनिकता के केंद्र में बहुराष्ट्रीय आवारा पूंजी की भूमंडलीयता है, इस तरह पूंजीवाद ने स्वयं को एक विश्व-व्यवस्था सिद्ध किया है।"

डॉ.मृत्युंजय सिंह ने अपने लेख में बताया है कि "उत्तरआधुनिकता एक ऐसी अवधारणा के रूप में हमारे सामने आई, जिसके राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर प्रायः आरोप-प्रत्यारोप किए जाते रहे हैं।" डॉ.जी. नीरजा ने बताया कि उत्तरआधुनिकता आधुनिकतावाद का नया विस्तार है... वस्तुतः आधुनिकता और उत्तरआधुनिकता के बीच कोई बड़ी विभाजन रेखा नहीं है। डॉ.बलविंदर कौर का मानना है कि "असल में उत्तर-आधुनिकतावाद एक ऐसा ग्लोबल खेल है, जिसमें हम सब शरीक हैं। वह हमारी ही भूमंडलीय अवस्था की रामायण है; जिसमें हम सबका बोध बदल रहा है और हमारे सभी सांस्कृतिक-ज्ञानात्मक प्रतीक बाज़ारवाद में बिकने को खड़े हैं।"

        डॉ.भीमसिंह ने अपने लेख ‘उत्तर आधुनिक साहित्य में दलित-संदर्भ' में यह निष्कर्ष निकाला है कि "उत्तर आधुनिक परिदृश्य में एक ओर समाज एवं राष्ट्र ही दलित नहीं हो रहे, भाषाएँ भी दलित हो रही हैं। अतः ‘दलित संदर्भ’ भारतीय परिप्रेक्ष्य में विमर्श की अपेक्षा रखता है।" स्त्रीलेखन पर अपने विचार रखते हुए डॉ.पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव कहते हैं कि लेखिकाएँ नारी जीवन पर अच्छी तरह लिख सकती हैं क्योंकि इन्होंने नारी के दर्द को भोगा है। डॉ.करन सिंह ऊटवाल अपने लेख में ‘नाटक, रंगमंच और उत्तरआधुनिकता’ पर प्रकाश डालते हैं। डॉ. घनश्याम इस विषय को आदिवासी जीवन से जोड़ कर देखते हैं तो प्रणव कुमार ठाकुर उत्तर आधुनिकता और समकालीन हिंदी कविता में आदिवासी समाज की पड़ताल करते हैं।डॉ. साहिरा बानू बी.बोरगल उत्तरआधुनिक संदर्भ में साहित्यिक भाषा के मुहावरों, कहावतों और सूक्तियों के माध्यम से 'उत्तर' खोजती हैं।

'स्रवंति' का यह अंक पत्रिका नहीं अपितु एक संक्षिप्त से संदर्भ ग्रंथ की तरह संजोने योग्य है। विषयानुसार मुखपृष्ठ पर शौकिया चित्रकार लिपि भारद्वाज ने बडी सूक्षमता और सटीकता से उत्तराधुनिकता का प्रतीक चुना है। इतना सार्थक अंक निकालने के लिए ‘स्रवंति’ टीम बधाई का पात्र है।


समीक्षित पत्रिका का विवरण

पत्रिका का नांम : स्रवंति [मासिक]
सह-सम्पादक : डॉ. जी. निरजा

अंक : फ़रवरी २०११

मूल्य: १५ रुपये

प्रकाशक : दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आन्ध्र

खैरताबाद, हैदराबाद - ५०० ००४.



स्रवंति' का उत्तर-आधुनिकता विशेषांक लोकार्पित




  






हैदराबाद,5 मार्च 2011 .
''उत्तर-आधुनिकता बेहद उलझी हुई अवधारणा है. इसकी सैद्धांतिकी और हिन्दी साहित्य में उसके प्रतिफलन की पड़ताल करने वाला 'स्रवंति' का विशेषांक विषय की यथासंभव सीधी पहचान के कारण पठनीय और संग्रहणीय है.स्त्री, दलित, आदिवासी और जनजातीय हाशियाकृत समुदायों की अभिव्यक्ति का उत्तर-आधुनिक विमर्श के पहलुओं के रूप में विवेचन इसमें सभी विधाओं के सन्दर्भ में किया गया है जो इसे शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी बनाने वाला है.''

ये विचार यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के 'साहित्य संस्कृति मंच' के तत्वावधान में आयोजित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की साहित्यिक पत्रिका 'स्रवंति' के विशेषांक के लोकार्पण समारोह में अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय [इफ्लू]के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. एम.वेंकटेश्वर ने व्यक्त किए. उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में पत्रिका के ''उत्तर-आधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य '' विशेषांक का लोकार्पण करते हुए कहा कि लघु पत्रिका के रूप में 'स्रवंति' ने दक्षिण भारत में अनेक नए लेखकों को प्रोत्साहित किया है तथा इस तरह हिंदी आंदोलन को प्रसारित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है.

समारोह की अध्यक्षता गैर-यूनिस विश्वविद्यालय , बेनगाज़ी [लीबिया] के अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष प्रो.गोपाल शर्मा ने की. उन्होंने 'स्रवंति' के एक वर्ष के मुखचित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया. इन चित्रों के लिए शौकिया-फोटोग्राफर लिपि भारद्वाज की रचनात्मकता की प्रशंसा करते हुए प्रो. गोपाल शर्मा ने याद दिलाया कि आज दुनिया तेज़ी से उत्तर - उत्तर आधुनिकता की ओर बढ़ रही है. उन्होंने ट्यूनीशिया,मिस्र और लीबिया की जन क्रान्त्यों और साथ ही मज़हबी कट्टरवाद के उभार को उत्तर आधुनिकता की समाप्ति और उत्तर-उत्तर आधुनिकता के आरम्भ का लक्षण माना. प्रो. शर्मा ने नव -मीडिया के व्यापक प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में हर पाठक को लेखक बनना होगा.

समारोह के द्वितीय चरण में 'स्रवंति' की सह-संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को मोतियों की माला, शाल, श्रीफल,लेखन सामग्री,स्मृति चिह्न और पुष्प गुच्छ प्रदान कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया. साथ ही कोसनम नागेश्वर राव को भी उत्तम कार्य के लिए शाल और स्मृति चिह्न प्रदान किया गया.

इसके पूर्व दीप-प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के बाद संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अतिथियों का परिचय कराते हुए स्वागत -सत्कार किया तथा आंध्र-सभा के सचिव डॉ. पी. राधाकृष्णन ने सभा की गतिविधियों की जानकारी दी. डॉ. जी. नीरजा ने लोकार्पित विशेषांक का परिचय दिया.

समारोह के तीसरे चरण में कवयित्री ज्योति नारायण ने विशेष अतिथि के रूप में काव्य पाठ करते हुए अपनी चुनींदा हिन्दी-ग़ज़लों और होली के गीतों का सस्वर वाचन किया. साथ ही डॉ. बी. बालाजी, चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, भगवान दास जोपट, गुरु दयाल अग्रवाल और विनीता शर्मा ने भी अलग-अलग विषयों और विधाओं की रचनाएँ प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी.

कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. करन सिंह ऊटवाल, डॉ. साहिरा बानू, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.गोरख नाथ तिवारी, डॉ.देवेंद्र शर्मा, डॉ.सुरेंद्र शर्मा, डॉ.पेरीसेट्टी श्रीनिवास राव, डॉ. सुनीला सूद, ए.जी.श्रीराम, भगवंत गौडर, अर्पणा दीप्ति, मंजु शर्मा, पी. के. कल्याणकर, उमारानी , रमा देवी, कादर अली खान, जुबेर अहमद, सुभाषिनी, अंजू,पी. पावनी, स्मिता हर्डीकर, मल्लिकार्जुन,शिव कांत, राजेश कुमार गौड़, एस.कौडू, हेमंता बिष्ट, संध्या रानी, दर्वेश्वरी, जी. नागमणि, सुशीला मीणा, सिसना, मोनिका देवी, सुशीला शर्मा, निशा सोनी, एम. राधा कृष्ण तथा छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया.

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