Sunday, March 20, 2011
भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य
भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य
आजकल भारत में ‘भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य’ को लेकर बहुत सी परिचर्चाएं, गोष्ठियों व कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।
अपनी भाषा को लेकर जो गर्व, जो उत्साह होना चाहिए उसकी हम भारतीयों में बहुत कमी है। हम हिंदी के ऩाम पर भाषणबाजी तो खूब करते हैं पर उतना श्रम और कर्म नहीं करते। हिंदी की सरकारी दावत तो खूब उड़ाई जाती है पर शिरोधार्य तो अँग्रेजी ही है।
हमारा नेता, हमारा लेखक और बुद्धिजीवी-वर्ग हिंदी की दुहाई तो बहुत देता है परन्तु अपने कुल-दीपकों को अँग्रेजी स्कूलों और विदेशों में ही शिक्षा दिलवाना चाहता है। ‘हाथी के दांत, खाने के और दिखाने के और।’
हमें अँग्रेजी बोलने, पढ़ने-लिखने और अँग्रेजियत दिखाने में अपना बड़प्पन दिखाई देता है किंतु सच तो यह है कि यह हमारी मानसिक हीनता ही है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने स्वदेश-प्रेम, स्वभाषा और स्व-संस्कृति की गरिमा पर जोर देते हुए कहा है-
निज भाषा उन्नति अहै; सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रविन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
अँग्रेजी पढ़िए, जितनी और अधिक भाषाएं सीख सकें सीखें किंतु अपनी भाषा को हीन करके या बिसराने की कीमत पर कदापि नहीं।
आजकल भारत में ‘भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य’ को लेकर बहुत सी परिचर्चाएं, गोष्ठियों व कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।
अपनी भाषा को लेकर जो गर्व, जो उत्साह होना चाहिए उसकी हम भारतीयों में बहुत कमी है। हम हिंदी के ऩाम पर भाषणबाजी तो खूब करते हैं पर उतना श्रम और कर्म नहीं करते। हिंदी की सरकारी दावत तो खूब उड़ाई जाती है पर शिरोधार्य तो अँग्रेजी ही है।
हमारा नेता, हमारा लेखक और बुद्धिजीवी-वर्ग हिंदी की दुहाई तो बहुत देता है परन्तु अपने कुल-दीपकों को अँग्रेजी स्कूलों और विदेशों में ही शिक्षा दिलवाना चाहता है। ‘हाथी के दांत, खाने के और दिखाने के और।’
हमें अँग्रेजी बोलने, पढ़ने-लिखने और अँग्रेजियत दिखाने में अपना बड़प्पन दिखाई देता है किंतु सच तो यह है कि यह हमारी मानसिक हीनता ही है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने स्वदेश-प्रेम, स्वभाषा और स्व-संस्कृति की गरिमा पर जोर देते हुए कहा है-
निज भाषा उन्नति अहै; सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रविन।
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
अँग्रेजी पढ़िए, जितनी और अधिक भाषाएं सीख सकें सीखें किंतु अपनी भाषा को हीन करके या बिसराने की कीमत पर कदापि नहीं।
जय हिंदी ----- जय जय हिंदी ।। ।। ।।
डॉ. सुधांशु चतुर्वेदी
डॉ. सुधांशु चतुर्वेदी के साहित्य-सृजन की हीरक जयंती पर हमारा शत-शत नमन॥
और कुछ विशेषताओं के लिए श्री सुधांशु की इस वेब में देख सकते हैं॥॥
Friday, March 18, 2011
होली की खुब सारी शुभकामनाये........
रंग के त्यौहार में
सभी रंगों की हो भरमार
ढेर सारी खुशियों से भरा हो आपका संसार
यही दुआ है हमारी भगवान से हर बार।
आपको और आपके परिवार को होली की खुब सारी शुभकामनाये इसी दुआ के साथ आपके व आपके परिवार के साथ सभी के लिए सुखदायक, मंगलकारी व आन्नददायक हो। आपकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो व सपनों को साकार करें। आप जिस भी क्षेत्र में कदम बढ़ाएं, सफलता आपके कदम चूम......
होली की खुब सारी शुभकामनाये........
आप का
राधा कृष्ण मिरियाला
भारतीय साहित्य : नारीवादी चेतना
भारतीय साहित्य : नारीवादी चेतना
राधाकृष्ण.मिरियाला
पुरुष प्रधान समाज में स्त्रीयों का दमन कोई नयी बात नहीं है आरम्भ से ही स्त्री कुंताये लिए जाती आ रही है उसकी इच्छाओं, आशाओं, आकांक्षाओं , का सदा से हे दमन होता आ रहा है
कई विद्वानों , मनीषियों जैसे गांधीजी के कुशल मार्गदर्शन एवं अनथक प्रयासों के चलते स्त्री ने अपनी शक्ती को पहचाना एवं समाजके विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान स्थापित की
'मनुस्मृति' में कहा गया है -----
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता
यत्रोतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वस्तात्राफलता: क्रिया:"
मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में --"संसार में जो सत्य है सुंदर है मैं उसे स्त्री का प्रतीक मानता हूँ
" जयशंकर प्रसाद की ' कामायनी ' में कहते हैं -
"नारी तुम केवल श्रद्दा हो ,
विश्व रजन नभ -पग-तल में
पीयूष स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में "
इस प्रकार हमारे साहित्यकारों ने समाज में स्त्री का स्टार बहुत ऊंचा माना है
इसलिए साहित्य जगत में सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा इनको आधुनिक ' मीरा ' कहा जाता है
अमृत प्रीतम जैसी साहित्य का पर्याय बन चुकी है
समय व समाज के परिवर्तन के साथ-साथ नारी की मात्रु-सत्तात्मक अधिकार का उन्मूलन ,पुरुष का उस पर अधिकार व सामाजिक स्वेच्छार की त्रासदी की विडम्बना नारी को झेलना पडा
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी ' नारी का मूल्य ' पुस्तक में कुरैश के लोगों के द्वारा अपनी कन्याओं का , मक्का के समीप अबूदिलाया पहाड़ पर वध किया जाने का उल्लेख किया है
वैदिक युग में स्त्री की स्तिथि बहुत ऊंची थी। ऐसा कहा जा सकता है की भारतीयों के सभी आदर्श स्त्री रूप में पाये जाते हैं । विध्या का आदर्श 'सरस्वती' में, धन का 'लक्ष्मी' में शक्ती का 'दुर्गा' में, सौन्दर्य का 'रति' में, पवित्रता 'गंगा' में, इतना ही नहीं सर्वव्यापी इश्वर को भी ' जगतजननी ' के नाम से सुशोभित किया गया है । उस युग में चाहे घर हो या परिवार , हर जगह नारी की स्थिति बहुत ही अच्छी थी ,वह बहुत आगे थी। 'यजुर्वेद' में ' सोमपुष्टा ' कहा गया है । बालिकाओं के लिए सिख्स ग्रहण करना उतना ही आवश्यक था जितना बालकों के लिए बाल विवाह की प्रथा नहीं थी ।
'पूर्ण ब्रह्मचार्येण कन्या युवानान विन्दते पतिम ।'
(अथर्ववेद - ११/१५/१८)
आत्मिक विकास की दृष्टी से भी स्त्रीयां पुरुषों के साथ एक ही क्षेत्र में विचरण करती थी ।
आद्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ धार्मिक क्षेत्र में भी स्त्री का पुरुष के बराबर ही अधिकार था । रामचन्द्रजी के द्वारा किये गए राजसूय यज्ञ में सीताजी की उपस्थिति बहुत आवश्यक थी । इसलिए स्वर्णमूर्ती को उनके स्थान पर रख कर यज्ञ की पूर्ती की गयी ।स्वयं ब्रह्मा
ने स्वीकार किया है की देवी ही इस ब्रह्माण्ड को धारण करती है । 'अथर्ववेद ' में स्त्री को साम्रज्ञ्नी का नाम दिया गया है । भारत के मध्यकाल में भी स्त्रीयों के अगाध पंडिता होने के दृष्टांत पाये जाते हैं । जिस समय शंकराचार्य ने अपने समय के प्रकांड मंडन मिश्र को परस्त कर दिया उस समय उसकी स्त्री विद्याधरी ने शंकराचार्य को कामासास्त्र विषय में परास्त किया । स्त्री का यह युग भारत के इतिहास का स्वर्ण युग कहा जा सकता है । एक विद्वान का कथन है कि यदि किसी देश के सांस्कृतिक स्टार का पता लगाना है तो पहले या देखो कि स्त्रीयों की अवस्था कैसी है ।
महाभारत काल विरोधाभासों से पूर्ण है । वहाँ नारी सम्मान का पात्र भी है । और सब पापों का जड़ भी ।बौद्द साहित्य व जातक कथाओं में नारी को सार्वजनिक उपयोग की वस्तुके रूप में चित्रित किया गया है आगे चलकर रीतिकाल व मुसलामानों के आगमन से जो गीत,मुक्तक, सवैयें, कवित्त कुंडलियों में नारी सौन्दर्य प्रेम के मांसल चित्रण व नारी स्थिति का चित्रण किया गया, उससे नारी लौकिक सौन्दर्य सम्पन्ना भोग्या मानी गयी ।
यह दुःख की बात है कि आधुनिक काल तक आते-आते स्त्री के दिव्यगुण धीरे-धीरे उसके अवगुण बनने लगे।साम्राज्ञी से वह धीरे-धीरे आश्रित बन गयी ।नारी की सामाजिक स्थिती अपने पतन की चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी ।
वैदिक युग का दृष्टिकोण जो स्त्री के प्रति दिव्य कल्पनाओं तथा पुनीत भावनाओं से परिवेष्टित था अब पूर्णतया बदल चुका था ।यह युग तो जैसे स्त्रीयों की गिरावट का युग था।उनके मानसिक तथा आत्मिक विकास के द्वार पर ताला लगा दिया गए।
उनकी साहित्यिक उन्नति के मार्ग पर अनेकों प्रतिबन्ध लगा दिए गए। 'स्त्री शूद्रो नाधीयातम ' जैसे वाक्य रच कर उसे शूद्र की कोटि में रख दिया ।स्त्री को संस्कार के अतिरिक्त और सभी संस्कारों से वंचित कर दिया।
18 वीं शताब्दी में स्त्रीयों की हालत जितनी खराब थी उसमे 19 वीं सदीमें कुछ सुधार आया धार्मिक आडम्बर ,रूढीगत विचार जैसे अंधविश्वासों का बोलबाला चारों तरफ इस प्रकार निर्मित कर दिया था कि उसे तोड़ सकना सहज संभव नहीं था। इस बर्बर के प्रति प्रति क्रिया स्वरुप राजा राममोहन राय हमारे सामने आये जो नारी वकालत लगातार करते रहे ।नारी पर होनेवाले अनेक सामाजिक अत्याचारों को उन्होंने ख़तम किया और स्त्री सिक्षा का आरंभ किया।
द्विवेदी युग में सुधारवादी आंदोलनों के माध्यम से कवि का ध्यान नारी -अस्मिता की ओर आकर्षित हुआ और पुरुष की साझीदार नारी अपने सम्पूर्ण मानसिक एवं आध्यात्मिक सौन्दर्य के साथ काव्य का विषय बनी। इस युग के साहित्यकार राम नरेश त्रिपाटी , हरिऔद , मैथिली शरण गुप्त ने नारी के प्रति इसी दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। नयी कविता तक आते-आते नारी हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी करने लगी थी। डा.हरिचरण शर्मा की दृष्टि में -आज नारी दलित द्राक्षा के सामान निचुड़ भले ही जाय किन्तु पुरुषों को भी पूर्णतः निचोड़ने में विश्वास करती है। नारी जीवन की अनेक समस्याओं और अनेक प्रशनों को इस काल के साहित्यकारों ने साहित्य का विषय बनाया।
आज नारीवाद वैश्विक्वाद बनगया है जिसके माध्यम से विश्व की नारियाँ व उनकी समस्याएँ आपस में जुडी हुई हैं। इस के द्वारा सहस्राब्दियों से अपने प्रति होते आये अत्याचार व प्रताड़नाओं के विरोध में नारी को अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मिला है । भारतीय साहित्य की मुख्य विधाओं में नारीवाद के प्रतिपादन द्वारा जीवन के आर्थिक, राजनीतिक, सामजिक,व्यावहारिक ,शैक्षिक,औद्योगिक आदी क्षेत्रों में नारी सक्रीय भागीदारी बढ़ रही है। नारीवाद 'नारी के सामान भागीदारी से समाज का पुनर्निर्माण ' चाहता है। आज के नारीवादी साहित्य नारी की इच्छाओं -आकाँक्षाओं का दस्तावेज है । नारी की योग्य ,मोहिनी,यथार्थवादी दृष्टि अब अज्ञेय, धर्मवीर प्रसाद, शांता सिन्हा, शकुंतला माधुर,कीर्ती चौदरी की कविताओं में विकसित है-
"फूल को प्यार करो
झरे तो झर जाने दो ,
जीवन का रस लो
देह मन आत्मा की रसना से
जो भरे उसे भार्जाने दो।" -अज्ञेय ...
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी की पहली कहानी के रूप में जिन कहानियों की चर्चा की है उनमें एक लिखिका की कहानी 'बंगमहिला' की 'दुलाईवाली' है ।
बंगमहिला हिंदी की प्रथम कहानी-लेखिका है । यह रचना सन 1907 में की थी । यह कहानी एक हास्य-कथा है जिसमें नारी की स्थिति का वर्णन हुआ है। छायावादी कालमें यदि सुभद्रा कुमारी चौहान ,महादेवी वर्मा को स्त्री-कविता परिवृत्त बड़ा करने का श्रेय है तो छायावादोत्तर काल में जो स्त्री-स्वर उभरें उनमें विशेष हैं - अमृता भारती, शकुन्त माथुर , ज्योत्स्ना मिलन, कांता-चौदरी ,सुनीता जैन, इंदु जैन,मोना गुलाटी ,अर्चना वर्मा आदी ।
20 वीं शताब्दी में कहानियों में समाज की निर्दयता व क्रूरता का जीवंत चित्रण मिलता है।
नारी चित्रण त्याग और सेवा की प्रतिमूर्ति के रूप में हुआ है । इस समय की प्रमुख कहानी लेखिकाएँ श्रीमती विमला देवी चौदरानी, विद्यावती ,राजरानी देवी, चन्द्रप्रभा देवी महरोत्रा , जनकदुलारी देवी , श्रीमती मनोरमा देवी आदि हैं।
नए उपन्यासकार नारी के सन्दर्भ में उसके समकालीन जीवन बोध की अपेक्षा उसके यौन-ग्रसित पक्ष को प्रस्तुत करने में सक्रीय रहे हैं । मृदुला गर्ग का उपन्यास 'चितकोबरा' फनीश्वरनाथ रेणु 'प्लूट बाबू रोड' , नागर का 'नाच्यो बहुत गोपाल' , मन्नूभंडारी का 'आपका बंटी' कृष्ण सोबती का 'सूरजमुखी अँधेरे के ',महेंद्र भल्ला का 'एक पति के नोट्स ',ममता कालिया का 'बेघर' नारी पुरुष के भावहीन संबंधों को उदघाटित करते हैं ।
पंडित नेहरु ने भी 'हिन्दुस्थान की समस्याएँ' में नारी की समस्या को प्रमुख मानकर लिखा है-
"पुरुषों से मैं कहता हूँ कि तुम स्त्रीयों को अपने दास्यत्व से मुक्त होने दे , उन्हें अपने बराबर समझो उन्हें अपने बराबर समझो उन्हें अपने बराबर समझो ।"
पन्तजी कहा --- "मुक्त करो नारी को मानव
चिरावंदिनी नारी को
युग-युग की बर्बरता से
जननी सभी प्यारी को ।"
आज के नए उपन्यासों और कहानीकारों की द्रिश्तीमें नारी युगबोध, भाव बोध बदल गया है।पारंपरिक मूल्यों के विरुद्ध संघर्ष करती हुई 'Angry Women' मानसिकता ही हिंदी की समकालीन कहानी में व्यंजित हुई है।प्रेमचंद ने अपनी उपन्यासों में नारी का चित्रण ऐसे किया कि सामाजिक अंधविश्वासों के प्रति प्रतिघटित करती है ।उदाहरण-गोदान में 'धनिया' का पात्र मोहन राकेश की 'मिस-पाल', राजेन्द्र यादव की 'छोटे-छोटे-ताजमहल ',उषा प्रियंवदा की 'नागफनी के फूल' ममता कालिया का 'नितांत निजी ' में समकालीन नारी चेतना , नारी जीवन का यथार्थ उभर कर आया है।
मलयालम साहित्य के कवी के .वी. शंकर पिल्लै ने भी अपनी कविता में नारी के प्रति सहानुभूथी झलकाई है-------
उर्मिला/तुम्हारे सघन घुंघराले बाल/लम्बी बाहें / लाल-लाल अधर /और तुम्हारे छोटे-छोटे स्तन /वसंत ऋतु के बीतते-बीतते /उभर आती तुम्हारी सिसकियाँ /मैं फिर एक बार /भूलने को मजबूर हो गया हूँ।
कन्नड़ महिला लेखिकाओं में वीणा-शांतेश्वर का नाम प्रमुख है। इनकी कहानियों में चित्रित आज की महिला की पीड़ा और उसके भीतर धीरे-धीरे पनपनेवाले स्वाभिमान की दुनिया है। पुरुष वर्ग द्वारा किये गए अन्याय और शोषण का चित्रण इनमें होने के बावजूद कहीं भी नारी -स्वातंत्र्य के आन्दोलन जैसी नारेबाजी इनमें दिखाई नहीं पड़ती है। स्थिति को तटस्थ होकर देखने के कारण इनमें एकपक्षीयवाद सुनायी नहीं पड़ता है और इसलिए ये कहानियाँ अधिक प्रभावशाली है।
तेलुगु के प्राचीन महान कवि वेमना अपनी रचनाओं में स्त्री पर जो अत्याचार हो रहे हैं उसके प्रति अपनी कविताओं के जरिये खंडन किया।उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से नारीवादी चेतना में सहयोग नहीं दिया। परन्तु अपना रचना द्वारा स्त्री जाति पर हो रहे अन्यायों के प्रति अपनी आवाज़ उठाई । स्त्री के प्रति प्रेम भावना तथा जीवंविधानों पर प्रकाश डाला।
आधुनिक युग के तेलुगु कवी सुरवरं प्रताप रेड्डी ने कहा कि ----"प्राचीन काल से हिन्दू समाज का चरित्र है ।" सुरवरंएक अभुदयावादी कवि हैं ।उन्होंने अपनी रचनाओं में नारी को महत्वपूर्ण स्थान दिया । तेलुगु में गद्य तिक्कन्ना नाम से प्रसिद्द गुराजादा अप्पाराव तथा दक्षिण भारत के नारी जनोद्दरक वीरेशलिंगम पन्तुलु आदि महापुरुषों ने नारीवादी चेतना के प्रति आन्दोलन छेड़ा और वह सफल भी हुए ।तेलुगु साहित्य के आधुनिक काल में नारी के प्रति सहानुभूति व्यक्त करनेवालों में श्री कन्दुकूरी वीरेशलिंगम पन्तुलु, गुराजाड़ा अप्पाराव , गुडिपुदी. वेंकटाचलम, गोपीचंद, कोदवातीगंटी कुटुम्बराव आदि प्रमुख हैं।आधुनिक युग की स्त्री लेखिकाएँ -इल्लंदल सरस्वती देवी, श्रीदेवी,वासीरेड्डी सीतादेवी आदि गद्य व कथा साहित्य से जुडती हैं तो जयप्रभा .सावित्री ,विमल कोंदापूदी निर्मला आदि काव्य क्षेत्र से जुडी हैं। इनमें जयप्रभा ने अपने काव्य-संग्रह 'सूर्युदु कूड़ा उदयिस्ताडु ' , 'वामनुडि मूड़ोपादम ' "इक्कड कुरिसिना वर्षाम एक्कड़ी मेघानिदी" 'यशोधरा ई वगापेंदुके' आदि में नवीन शब्द ,बिम्ब, प्रतीक और भाषा के माध्यम से पारंपरिक नारी का तिरस्कार ही नहीं करती बल्कि नारीवाद की स्पष्ट अभिव्यक्ती करती हैं । कोंडापूड़ी निर्मला के 'संदिग्ध संध्या '' "नडिचे " , "गेयालू " आदि काव्य संग्रह भी नारीवादी विचारधारा से ओताप्रेत है ।समसामयिक कवी शिवसागर का 'चेल्ली चन्द्रम्मा' गद्दार का "सिरिमल्ले चेट्टूकिन्दा " उल्लेखनीय हैं।
नारीवादी की दृष्टी से तेलुगु के उपन्यासों का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। तेलुगु में नारीवादी साहित्य का नाम लेते ही औलगा का नाम स्मरण आये बिना नहीं रहता । औलगा नारी की सम्पूर्ण स्वेच्छा की प्रबल दावेदार हैं । उनका उपन्यास 'स्वेच्छा' में नारी को सम्पूर्ण स्वेच्छाकान्क्शी के रूप में चित्रित किया है जो नारीवाद की नींव है । इसके बाद औलगा की' सहजा', ' आकाशम लो सगम 'आदि उपन्यासों में भी नारीवाद का शाशाक्त-चित्रण मिलता है । औलगा के बाद मल्लादी सुब्बम्मा का नारी -स्वेच्छा की प्रबल समर्थक के रूप में लिया जाता है । ' वंशाम्कुरम ' , ' कन्नीटि केरटाल वेन्नेले ', 'जीवितगम्यम ' ,'मानवी ' आदि में नारी मुक्ति तथा आर्थिक स्वावलम्बिता का चित्रण मिलता है ।
औलगा की कहानी संग्रह ' राजकीय कथलु ' में भी नारी के मौलिक अधिकारों के हनन के विरोध में लेखिका की अभिव्यक्ति अत्यंत स्पष्ट है । २० वीं सदी के अंतिम दशक में जयधीर तिरुमाला राव के संपादकत्व में 'स्त्रीवाद -कथलु ' 1993 अब्बूरीछाया देवी , तुरगा जानकी रानी , आदी लेखिकाओं ने अपनी कहानी के माध्यम से नारीवाद का झंडा पहराया । आज स्त्रीवादी लेखन के माध्यम से भी नारीवादी चेतना प्रतिध्वनित हो रही है । पश्चिम में वर्जीनिया वूल्फ , मरीना स्वेतएवा, अन्ना अखमतोवा , सिल्विया प्लैथ, ऐन सेक्सटन कवयित्रियाँ अपनी विशिष्ट भाषा -शैली में नारी - चेतना को उजागर कर रही है । समकालीन स्त्री-कवियों में -आसिवासी कवि निर्मला - पुतुल , शुगुफ्ता खान , विस्थापित कश्मीरी -कवयित्री क्षमा-कौल , अनीता वर्मा, मधु शर्मा, नीलेश रघुवंशी , शुभा, कात्यायनी, अनामिका , निर्मला गर्ग व सविता सिंह ,गगन गिल ,तेजि ग्रोवेर आते हैं जिन्होंने स्त्री-संसार के विशिष्ट अनुभव-वृत्तों का सजग आकलन किया है ।
नारीवाद वैश्विकवाद है । यह विश्व की नारियों को और उनकी समस्याओं को आपस में जोड़ने का प्रयास करता है। नारीवाद एक जीवन-दर्शन है ; एक आन्दोलन है जिसके अंतर्गत सभी प्रकार के शोषण विशेषकर नारी-शोषण का विरोध किया जाता है । समाज में समानता तभी स्थापित होगी जब नारी व पुरुष एक दूसरे के अस्तित्व को सम्मान देंगे । BELL HOOKS ने अपनी पुस्तक Activist &Feminist में लिखा है - When Women and Men understand that working to eradicate patriarchal domination is a struggle rooted in the longing to make a world where everyone can live fully and freely,then we know our work to be a gesture of love.let us draw upon that lov to heighten our awareness ,deepen our compassion, intensify our courage and strengthen our commitment.....
Wednesday, March 16, 2011
Tuesday, March 8, 2011
'स्रवंति' का उत्तरआधुनिकता विशेषांक'
'स्रवंति' का उत्तरआधुनिकता विशेषांक लोकार्पित'
मैं ‘स्रवंति’ का विशेष रूप से इसलिए आभारी हूँ कि इस पत्रिका के ‘उत्तर आधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ विशेषांक के माध्यम से उत्तर आधुनिकता के कन्सेप्ट से परिचित हो पाया। यह सही है कि अब भी इस विमर्श को पूरी तरह समझने में विद्वान ही समर्थ नहीं हो पाये हैं, जैसा कि इस पत्रिका में लिखे लेखों से पता चलता है; तो हम क्या पूरी तरह समझ सकेंगे!
‘स्रवंति’ का फरवरी अंक विशेषांक के रूप में आना एक सुखद आश्चर्य रहा। इस अंक के सम्पादकीय में विषय की रूपरेखा और स्वरूप की जानकारी मिलती है जो उत्तर आधुनिकता जैसे पेचीदा विषय की भूमिका के रूप में पाठक की सहायक बनती है।प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अपने लेख ‘उत्तर आधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ में विषय प्रवेश करते हुए बताया है कि "उत्तर आधुनिकता ने उन समूहों को केंद्र में लाने का प्रयास किया है जो परिधि पर थे - इसे हाशियाकृत की सार्वजनीन स्वीकृति के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श और आदिवासी विमर्श जैसी प्रवृत्तियों के उभार की व्याख्या इस दृष्टि से की जानी आवश्यक है।"
प्रो. दिलीप सिंह अपने लेख ‘उत्तर-आधुनिक विमर्श: एक बहस’ में यह स्पष्ट करते हैं कि सारा यूरोप, विशेष कर फ़्रांस और रूस, जिन्हें उत्तरआधुनिक विमर्श के केंद्र में रखा जाता है, आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता को दो भिन्न काल खंड में विभाजित चिंतन या परिस्थितियाँ नहीं मानते। वे बताते हैं कि "भारतेंदु और द्विवेदी युग में स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, दलितोद्धार के जो स्वर साहित्य में मुखरित हैं वे तत्कालीन समाज को निश्चित ही तब उत्तर-आधुनिक विमर्श लगे हों तो कोई अचरज नहीं।"
‘उत्तर आधुनिक विमर्श’ की सैद्धांतिकी के कुछ प्रधान तत्व तथा प्रवृत्तियों पर चर्चा करते हुए अर्जुन चौहान कहते हैं कि "बनाना तथा बिगाड़ना, बसाना तथा उजाड़ना, विकास तथा विनाश ये सब उत्तराधुनिकता की प्रवृत्तियां हैं।... उत्तराधुनिक विमर्श वैध-अवैध या नैतिक-अनैतिक को कोई स्थान नहीं देता।"
प्रो. एम. वेकटेश्वर अपने लेख ‘उत्तरआधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य’ में बताते हैं कि "उत्तरआधुनिकता उस विश्वव्यापी आधुनिकता के प्रति एक प्रतिक्रिया है जो सामान्यतः प्रत्यक्षवादी प्रौद्योगिकी प्रधान एवं तार्किक मानी जाती है।" उन्होंने देरिदा, ल्योतार, मिशेल फ़ूको, डॉ. सुधीश पचौरी, मनोहर श्याम जोशी जैसे कई विद्वानों को उद्धृत किया है और निष्कर्ष निकाला है कि "उत्तर आधुनिकता के केंद्र में बहुराष्ट्रीय आवारा पूंजी की भूमंडलीयता है, इस तरह पूंजीवाद ने स्वयं को एक विश्व-व्यवस्था सिद्ध किया है।"
डॉ.मृत्युंजय सिंह ने अपने लेख में बताया है कि "उत्तरआधुनिकता एक ऐसी अवधारणा के रूप में हमारे सामने आई, जिसके राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर प्रायः आरोप-प्रत्यारोप किए जाते रहे हैं।" डॉ.जी. नीरजा ने बताया कि उत्तरआधुनिकता आधुनिकतावाद का नया विस्तार है... वस्तुतः आधुनिकता और उत्तरआधुनिकता के बीच कोई बड़ी विभाजन रेखा नहीं है। डॉ.बलविंदर कौर का मानना है कि "असल में उत्तर-आधुनिकतावाद एक ऐसा ग्लोबल खेल है, जिसमें हम सब शरीक हैं। वह हमारी ही भूमंडलीय अवस्था की रामायण है; जिसमें हम सबका बोध बदल रहा है और हमारे सभी सांस्कृतिक-ज्ञानात्मक प्रतीक बाज़ारवाद में बिकने को खड़े हैं।"
डॉ.भीमसिंह ने अपने लेख ‘उत्तर आधुनिक साहित्य में दलित-संदर्भ' में यह निष्कर्ष निकाला है कि "उत्तर आधुनिक परिदृश्य में एक ओर समाज एवं राष्ट्र ही दलित नहीं हो रहे, भाषाएँ भी दलित हो रही हैं। अतः ‘दलित संदर्भ’ भारतीय परिप्रेक्ष्य में विमर्श की अपेक्षा रखता है।" स्त्रीलेखन पर अपने विचार रखते हुए डॉ.पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव कहते हैं कि लेखिकाएँ नारी जीवन पर अच्छी तरह लिख सकती हैं क्योंकि इन्होंने नारी के दर्द को भोगा है। डॉ.करन सिंह ऊटवाल अपने लेख में ‘नाटक, रंगमंच और उत्तरआधुनिकता’ पर प्रकाश डालते हैं। डॉ. घनश्याम इस विषय को आदिवासी जीवन से जोड़ कर देखते हैं तो प्रणव कुमार ठाकुर उत्तर आधुनिकता और समकालीन हिंदी कविता में आदिवासी समाज की पड़ताल करते हैं।डॉ. साहिरा बानू बी.बोरगल उत्तरआधुनिक संदर्भ में साहित्यिक भाषा के मुहावरों, कहावतों और सूक्तियों के माध्यम से 'उत्तर' खोजती हैं।
'स्रवंति' का यह अंक पत्रिका नहीं अपितु एक संक्षिप्त से संदर्भ ग्रंथ की तरह संजोने योग्य है। विषयानुसार मुखपृष्ठ पर शौकिया चित्रकार लिपि भारद्वाज ने बडी सूक्षमता और सटीकता से उत्तराधुनिकता का प्रतीक चुना है। इतना सार्थक अंक निकालने के लिए ‘स्रवंति’ टीम बधाई का पात्र है।
समीक्षित पत्रिका का विवरण
पत्रिका का नांम : स्रवंति [मासिक]
सह-सम्पादक : डॉ. जी. निरजा
अंक : फ़रवरी २०११
मूल्य: १५ रुपये
प्रकाशक : दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा-आन्ध्र
खैरताबाद, हैदराबाद - ५०० ००४.
स्रवंति' का उत्तर-आधुनिकता विशेषांक लोकार्पित
हैदराबाद,5 मार्च 2011 .
''उत्तर-आधुनिकता बेहद उलझी हुई अवधारणा है. इसकी सैद्धांतिकी और हिन्दी साहित्य में उसके प्रतिफलन की पड़ताल करने वाला 'स्रवंति' का विशेषांक विषय की यथासंभव सीधी पहचान के कारण पठनीय और संग्रहणीय है.स्त्री, दलित, आदिवासी और जनजातीय हाशियाकृत समुदायों की अभिव्यक्ति का उत्तर-आधुनिक विमर्श के पहलुओं के रूप में विवेचन इसमें सभी विधाओं के सन्दर्भ में किया गया है जो इसे शोधार्थियों के लिए विशेष उपयोगी बनाने वाला है.''
ये विचार यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के 'साहित्य संस्कृति मंच' के तत्वावधान में आयोजित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की साहित्यिक पत्रिका 'स्रवंति' के विशेषांक के लोकार्पण समारोह में अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय [इफ्लू]के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. एम.वेंकटेश्वर ने व्यक्त किए. उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में पत्रिका के ''उत्तर-आधुनिक विमर्श और समकालीन साहित्य '' विशेषांक का लोकार्पण करते हुए कहा कि लघु पत्रिका के रूप में 'स्रवंति' ने दक्षिण भारत में अनेक नए लेखकों को प्रोत्साहित किया है तथा इस तरह हिंदी आंदोलन को प्रसारित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है.
समारोह की अध्यक्षता गैर-यूनिस विश्वविद्यालय , बेनगाज़ी [लीबिया] के अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष प्रो.गोपाल शर्मा ने की. उन्होंने 'स्रवंति' के एक वर्ष के मुखचित्रों की प्रदर्शनी का उद्घाटन भी किया. इन चित्रों के लिए शौकिया-फोटोग्राफर लिपि भारद्वाज की रचनात्मकता की प्रशंसा करते हुए प्रो. गोपाल शर्मा ने याद दिलाया कि आज दुनिया तेज़ी से उत्तर - उत्तर आधुनिकता की ओर बढ़ रही है. उन्होंने ट्यूनीशिया,मिस्र और लीबिया की जन क्रान्त्यों और साथ ही मज़हबी कट्टरवाद के उभार को उत्तर आधुनिकता की समाप्ति और उत्तर-उत्तर आधुनिकता के आरम्भ का लक्षण माना. प्रो. शर्मा ने नव -मीडिया के व्यापक प्रभाव की चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में हर पाठक को लेखक बनना होगा.
समारोह के द्वितीय चरण में 'स्रवंति' की सह-संपादक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को मोतियों की माला, शाल, श्रीफल,लेखन सामग्री,स्मृति चिह्न और पुष्प गुच्छ प्रदान कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया. साथ ही कोसनम नागेश्वर राव को भी उत्तम कार्य के लिए शाल और स्मृति चिह्न प्रदान किया गया.
इसके पूर्व दीप-प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के बाद संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अतिथियों का परिचय कराते हुए स्वागत -सत्कार किया तथा आंध्र-सभा के सचिव डॉ. पी. राधाकृष्णन ने सभा की गतिविधियों की जानकारी दी. डॉ. जी. नीरजा ने लोकार्पित विशेषांक का परिचय दिया.
समारोह के तीसरे चरण में कवयित्री ज्योति नारायण ने विशेष अतिथि के रूप में काव्य पाठ करते हुए अपनी चुनींदा हिन्दी-ग़ज़लों और होली के गीतों का सस्वर वाचन किया. साथ ही डॉ. बी. बालाजी, चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, भगवान दास जोपट, गुरु दयाल अग्रवाल और विनीता शर्मा ने भी अलग-अलग विषयों और विधाओं की रचनाएँ प्रस्तुत कर वाहवाही लूटी.
कार्यक्रम को सफल बनाने में डॉ. करन सिंह ऊटवाल, डॉ. साहिरा बानू, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.गोरख नाथ तिवारी, डॉ.देवेंद्र शर्मा, डॉ.सुरेंद्र शर्मा, डॉ.पेरीसेट्टी श्रीनिवास राव, डॉ. सुनीला सूद, ए.जी.श्रीराम, भगवंत गौडर, अर्पणा दीप्ति, मंजु शर्मा, पी. के. कल्याणकर, उमारानी , रमा देवी, कादर अली खान, जुबेर अहमद, सुभाषिनी, अंजू,पी. पावनी, स्मिता हर्डीकर, मल्लिकार्जुन,शिव कांत, राजेश कुमार गौड़, एस.कौडू, हेमंता बिष्ट, संध्या रानी, दर्वेश्वरी, जी. नागमणि, सुशीला मीणा, सिसना, मोनिका देवी, सुशीला शर्मा, निशा सोनी, एम. राधा कृष्ण तथा छात्र-छात्राओं ने सक्रिय सहयोग प्रदान किया.
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