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Wednesday, March 30, 2011

नामवर सिंह जी के एक विडियो !!!

नामवर सिंह जी के एक विडियो !!!

भारतीय उपन्यास की अवधारणा




डा. नामवर सिंह के साथ  राधाकृष्ण मिरियाला

"शमशेर शताब्दी समारोह " संपन्न



शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर की रचनात्मकता का लक्ष्य है - अपने आपको देख पाना। इनकी 'बात -बोलेगी' कविता इस तथ्य का उदाहरण है -



बात बोलेगी

हम नही

भेद खोलेगी

बात ही।

सत्य का

क्या रंग

पूछो,एक रंग

एक जनता का दुःख एक

हवा में उड़ती पताकायें अनेक

दैन्य दानव । क्रूर स्थिति ।

कंगाल बुद्धि : मजदुर घर भर

एक जनता का अमर वर :

एकता का स्वर

अन्यथा स्वातंत्र इति।






                       एवं                     

के संयुक्त तत्वावधान में
"शमशेर शताब्दी समारोह " 

"शमशेर शताब्दी समारोह चित्रावली"

Get your ओवन
मार्च ३० समशेर शताब्दी की चित्रावली 

 "शमशेर शताब्दी समारोह " की स्थूल रूप से रिपोर्ट यहाँ पढी जा सकती है! 

"शमशेर शताब्दी समारोह "


 मार्च ३१ समशेर शताब्दी की चित्रावली

Tuesday, March 29, 2011

डा. ऋषभदेव शर्मा जी के द्वारा कविता शिक्षण की व्याख्यान !!!

                      *** कविता शिक्षण ***
साहित्य - शिक्षण के पाठ्यबिंदु :

                                                                                                          डा. ऋषभ देव शर्मा ...
   डा. ऋषभदेव शर्मा जी के द्वारा कविता शिक्षण की व्याख्यान !!!  
 ( दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रशिक्षण महाविद्यालय में )

(क)
             * साहित्यिक पृष्ठभूमि : 6
              * साहित्यिक रूढ़ियाँ तथा - समीक्षात्मक प्रतिमान : 5
              * साहित्यिक कृति : 4
(ख)
              * साहित्यिक कृति का गठन : 3
              * साहित्यिक कृति की बुनावट : 2
              * साहित्यिक कृति की भाषा : 1


         साहित्यिक कृति की वाचनगत विशिष्टता :
दो स्तर :
             * शब्दार्थ बोधक वाचन
             * साहित्यार्थ बोधक वाचन
  भाषा के रूप पर प्रायोगिक बिंदु
            * अपेक्षया अधिक अपरिचित शब्द
     (सामान्य शब्द ,पारिभाषिक शब्द,सांस्कृतिक शब्द )
            * विशिष्ट सह प्रयोग
(भाषिक सह प्रयोग, रूढ़ लाक्षणिक प्रयोग,-मुहावरें आदि )
            * सूक्ति


            * विशिष्ट प्रसंग
(पूरा कथा,इतिहास,भूगोल से सम्बंदित आदि )
          
            * व्याकरणिक विशेषताएँ
  (संरचनात्मक आदि)


कृति की बुनावट के स्तर पर

विशिष्ट साहित्यिक प्रभाव के निष्पादक


उपकरण--
                 शब्दालंकार,
                 अर्थालंकार,
                 प्रयोजनमूलक लाक्षणिक प्रयोग,
                 बलात्मक चयन,
                 विचलित प्रयोग आदि .


                 कृति के गठन के व्यापक स्तर पर : 
               बिम्ब,
                    कथावस्तु ,
                    चरित्र  ,
                   समग्रानुभूति आदि..


साहित्यिक रूढ़ियों की कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :
* कथावर्णन के प्रकार
(संवाद शैली, आतंरिक एकालाप शैली , पात्र शैली,सामान्य वर्णनात्मक शैली )

       * चरित्र चित्रण की पद्दतियाँ
(पात्रों का विशिष्ट नामकरण, प्रत्यक्ष चित्रण, परोक्ष चित्रण )
 भाषा समुदाय की सांस्कृतिक पृष्टभूमि :

यहाँ संस्कृति का व्यापक अर्थ अभीष्ट है


इस में भाषा-समुदाय का सारा भौतिक ,भावात्मक ,बौद्दिक ,विश्वासपरक, तथा सामाजिक
 समीक्षात्मक प्रतिमान का प्रसंग
समीक्षात्मक भाषा (शब्दावली तथा वाक्य विन्यास) एवं उससे अभिव्यक्त व्यंजनायें


हर  भाषा में साहित्य समीक्षा की भाषा में कुछ अंतर दिखाई पड़ते है जो प्रायः निम्न लिखित कोटियों में होते है


पारिभाषिक शब्द तथा मूल्यांकनपरक शब्द ..


हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
                                                                                                             - जयशंकर प्रसाद 
                                            कविता पाठ

तुम कनक किरण के अंतराल में

लुक चिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन  के घन , रस खान ढरते

हे लाज भरे सौदर्य बता दो

मौन बने रहते हो क्यों ?

अधरों के मधुर कगारों में

कल-कल दवानी के गुन्जारों में

मधु सरिता सी यह हंसी तरल

अपनी पीते रह्ते हो क्यों ?

बेला विभ्रम की बीत चली

रजनी गंधा की कली खिली


भाषा स्तरीय पाठ बिंदु

विशिष्ट शब्दों का अर्थ


* कनक - स्वर्ण,सोना; लुक छिपकर-बहुत गुप्त रूप से ; घन-घना; कन - कण; ढरते - लुढ़कते , बहते ; कगार - ऊँचा किनारा ;  विभ्रम - अस्थिरता,उत्कंठा ; बेला - समय,घड़ी;
मलय-आकुलित - (चन्दन पर्वत को स्पर्श कर आनेवाले) पवन के सामान चंचल; दुकूल-रेशमी वस्त्र ;
कलित -विभूषित



बनावट स्तरीय पाठ्य बिंदु
लाक्षणिक प्रयोग :
लाज भरा सौंदर्य = लज्जाशील सुंदर नारी ; कनक किरण का अंतराल = स्वर्णिम छठा .

विशिष्ट चयन : 
लुक छिपकर = लज्जा की कोमलता का अभिव्यंजक शारीरिक व्यापार ;विभ्रम की बेला =प्रिय मिलन की आतुरता को प्रकट करने वाली अभिव्यक्ति .

सादृश्य - विधान की अभिव्यक्तियाँ :
अधरों का मधुर कगार = ओठ रूपी ऊंचे किनारे ; सांध्य मलय-आकलित =संध्याकालीन मलय

गठन स्तरीय पाठ्य बिंदु
* बिम्ब
* चाक्षुस बिम्ब
गुण-कोमलता /माधुर्य

                    साहित्यिक भाषा स्तरीय पाठ्य बिंदु :

* नारी सौन्दर्य वर्णन की छायावादी परंपरा के अनुसार चरम सौंदर्य का मधुर प्रभावपरक तथा स्थूल का सूक्ष्म रूप में वर्णन .

* मानव सौंदर्य के वर्णन में प्रकृति के उपकरणों का पृष्टभूमि  के रूप में अथवा अभिव्यक्ति -वैशिष्ठ्य  के अंग के रूप में वर्णन .

सम्बोधानात्मकता

 समीक्षात्मक भाषा सतरीय पाठ्य बिंदु
    समीक्षात्मक भाषा विभिन्न भाषाओं के साहित्य की अपनी-अपनी रूढ़ियाँ होती हैं .
* पारिभाषिक शब्द -निर्देशात्मक :
लाज भरा सौंदर्य = लाक्षणिक प्रयोग; अधरों का मधुर कगार =रूपक अलंकार ; मधु सरिता सी यह हंसी = उपमा अलंकार ;तरल हंसी = विशेषण वक्रता ; सांध्य मलय -आकुलित = उपमा अलंकार .

* निष्कर्ष - स्तरीय मूल्यांकन परक शब्दावली :
 नारी सौंदर्य का कोमल , सात्विक-रोमानी चित्तरंजक ,तथा प्रधानतया लाक्षणिक शैली में अलंकृत वर्णन . श्रेष्ट शब्द चयन तथा संगीतात्मक वर्ण विन्यास का उदहारण .
सम्बोधानात्मकता से काव्योचित रोमानीपन की निष्पत्ति .
छायावादी काव्यदारा का स्तरीय नमाना 'प्रसाद' की....

* साहित्य- शिक्षण में लक्ष्य -भाषा (जिस भाषा में साहित्यिक रचना रची गयी है ) तथा निरूपक भाषा (साहित्यिक रचना की समीक्षा के लिए प्रयुक्त भाषा ),दोनों ही पाठ्य बिंदु हैं .

वास्तविक शिक्षण व्यापार में इन दोनो का  मिश्रित  व्यवहार  ही होता है- लक्ष्य भाषा केंद्र में रहती है , निरूपक भाषा  परिधि  पर  . विशेष बात यह है की भाषा प्रयोग के इन  दो  प्रकार्यात्मक  भेदो की हमें चेतना हो .

सन्दर्भ 

* प्रो. सुरेश कुमार, साहित्य शिक्षण के पाठ्यबिंदु (आलेख ), साहित्य भाषा और साहित्य शिक्षण 
      (१ ९९२ -उच्च शिक्षा और शोध संस्थान , 
      दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास ),
            पृष्ट : २६७-२७७  







डा. ऋषभदेव शर्मा जी के द्वारा कविता शिक्षण की व्याख्यान !!!
(यह विडियो में कुछ अंश छूट गए है लेकिन हमारें सर का हर एक पॉइंट भी हमारे लियें अमूल्य है इसीलिए जो विडियो मिला है उसी को एडिट कर दिया गया है( for B.Ed trainees& HPT Trainees))

  

Friday, March 25, 2011

महादेवी वर्मा जन्म दिवस की शुभ कामनाएँ 26-03-1907

महादेवी वर्मा


(1907-1987)



जन्म :  २६ मार्च १९०७

स्थान : फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश )

पिता : गोविन्द सहाय वर्मा

प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए.,

भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण ,ज्ञानपीठ पुरस्कार

रचनाएँ : नीहार, रश्मि ,संध्या गीत ,दीप शिखा ..........


महादेवी वर्मा की एक कविता 'नीहार' से!


  जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करुणा कितने सन्देश

पथ में बिछ जाते बन पराग ;

गाता प्राणों का तार तार

अनुराग भरा उन्माद राग ;

आँसू लेते वे पद पखार !

हँस उठते पल में अर्थ नैन

धुल जाता ओंठों  से विषाद,

छा जाता जीवन में वसंत

लूट जाता चिर संचित विराग ;

आँखें देतीं सर्वस्व वार !!!!


महादेवी वर्मा छायावाद के आधार स्तंभों  में से एक  हैं । अज्ञात  प्रियतम  के प्रति  वेदना  भाव की अभिव्यक्ति उनके काव्य में प्रमुखता से हुई।वेदना और करुणा की प्रधानता के कारण महादेवी जी को आधुनिक मीरा कहा जाता हैं ।अज्ञात प्रियतम के प्रति विरह वेदना की भावना के कारण ही उनकी काव्य में रहस्यवाद की प्रमुखता हैं  उनकी कृतियाँ ---नीहार,रश्मि ,नीरजा,सांध्यगीत एवं दीपशिखा में सर्वत्र वेदना व्याप्त हैं।

इस प्रकार महादेवी के काव्य में वेदना तत्व हैं।

इतना ही नहीं इनके काव्यों में मुख्यता: हमें ये दिखाई पड़ता हैं । 

१. प्रेम वेदना की गहनता
२. करुणा की प्रधानता
३. नारी सुलभ सात्विकता
४. महादेवी की आध्यात्मिकता
५. भक्ती की तन्मयता
    भक्ति  के विषय में महादेवी जी के काव्य में आध्यात्मिकता के साथ- साथ भक्ति भाव भी मुखुरित होता हैं।  भक्ति भाव से पूजा अर्चना करने के लिए देव की प्रतिमा के श्रृंगार की सारी सामग्री सजा कर वे पूजा अर्चना में लीन हो जाती हैं। हाँ सामग्री का रूप सामान्य भक्त की सामग्री से भिन्न हैं किन्तु पूजा का भाव वही हैं।

क्या पूजा क्या अर्चन रे ?
उस असीम का सुन्दर मंदिर मेरा लघुतम जीवन रे !
मेरी श्वासें करती रहतीं नित प्रिय का अभिनन्दन रे !!
    

   इस पूजा - अर्चना में पार्थिवता नहीं हैं,किन्तु तन्मयता वही हैं जो एक भक्त में होती हैं इसलिए यह कहा जा सकता है की  महादेवी के काव्य में उपलब्ध वेदना भक्ति की तन्मयता से परिपूर्ण है।

६. विरह वेदना की निरंतरता
                                                      आदि को हम देख सकते हैं ।

महादेवी वर्मा की रहस्य भावना
                      
                        महादेवी वर्मा छायावाद की प्रमुख कवयित्री हैं।   छायावादी कविता की एक प्रमुख विशेषता है उसमें पायी जाने वाली रहस्यवादी भावना  जब कवि उस आज्ञा सत्ता को प्रकृति में सर्वत्र देखता हैं, उससे अपना सम्बन्ध जोड़कर विरह निवेदन व्यक्त करता है और उस अज्ञात प्रियतम से मिलने के लिए छठपठाता है तो इस प्रकार के भावों को व्यक्त करनेवाली कविता को रहस्यवादी कविता कहा जाता है। प्रेम की यह भावना लौकिक ना होकर अलौकिक होती हैं जिसमे जीवात्मा की पीड़ा,वेदना, टीस एवं कसक का वर्णन किया जाता है।
उदा :                                      
                                                        मधुर-मधुर मेरे दीपक जल !
                                              
 युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
                                             
                                                      प्रियतम का पथ आलौकित कर !!  

महादेवी के काव्य में प्रगीती तत्व को भी हम देख सकते हैं ।
                    गीत में किसी एक विचार ,भाव या घटना  या चित्रण तन्मयता के साथ किया जाता है । इसकी रचना गेय पदों में होती है तथा उसमें भाषा की सुकुमारता विद्यामान रहती है गीतों में प्रायः वय्यक्तिक अनुभूतियाँ अर्थात आत्माभिव्यक्ती रहती है ।
विश्वकोष  के अनुसार --"गति काव्य में विशुद्ध  कलात्मक धरातल पर कवि के अंतर्मुखी जीवन का उदघाटन प्रमुख रूप से होता है और उसमे उसके हर्ष-उल्लास, सुख-दुःख एवं विषाद को वाणी प्रदान की जाती हैं "  भारतीय विचारक डा. श्याम सुन्दरदास ने भी 'प्रगीती' की परिभाषा  में आत्माभिव्यन्जना को प्रमुखता देते हुए कहा है --"गीति काव्य के छोटे-छोटे गेय पदों में मधुर भावानापन्न स्वाभाविक आत्म निवेदन रहता है। इन पदों में शब्द की साधना के  साथ-साथ संगीत के स्वरों का भी उत्कृष्ट साधना रहती है।  इनकी भावना प्रायः कोमल होती है और एक-एक पद में पूर्ण होकर समाप्त हो जाती है। " गीति काव्य में निजीपन के साथ-साथ रागात्मकता का होना अनिवार्य है  डा . दशरथ ओझा के अनुसार" जिस काव्य में एक तथ्य या एक भाव के साथ-साथ एक ही निवेदन, एक हीरास एक ही परिपाटी हो ---वह गीति काव्य है। "

इस विवेचना के आधार पर गीतिकाव्य के तत्व को निरूपित किया जा सकता हैं :
१.आत्मभिव्यन्जकता
२.रागात्मकता
३.काल्पनिकता 
४.संगीतात्मकता
५.भावगत एकरूपता 
६.आकारगत लघुता
७.शैली गत सुकुमारता
  
इतना ही नहीं महादेवी वर्मा की प्रतीक योजनाओं को भी देख सकते हैं ।


महादेवी वर्मा जीजी कविता में वेदना एवं रहस्यवाद की प्रधानता है।   उन्होंने भी अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में प्रतीकों का सहारा लिया है। प्रतीकात्मक भाषा
 का प्रयोग करके महादेवी जी ने एक ओर तो सूक्ष्म भावों एवं व्यापारों को अभिव्यक्त किया है तो दूसरी ओर उसमें कला जा अपूर्व चमत्कार भी समाविष्ट कर दिया है । 

उदा:::            
          प्रिय संध्या गगन मेरा जीवन
यह क्षितिज बना धुंधला विराग 
नव अरुणा अरुणा मेरा सुहाग 
छाया सी काय वीतराग 
सुधि भीने स्वप्न रंगीले घन 

समग्रतः यह कहा जा सकता है कि प्रतीकों का प्रयोग करते हुए महादेवी जी ने अपने काव्य में रमणीयता का विधान किया है।  प्रतीकात्मकता प्रायः सभी छायावादी कवियों की एक प्रमुख काव्यगत विशेषता मानी गयी है।  



                                    जय हिंदी --------जय हिंद !!!
अविस्मरणीय आधुनिक मीरा नारी वादी चेतना का स्वरुप
श्री महादेवी वर्मा को फिर से एक बार हिंदी जगत की तरफ जन्मदिन की शुभकामनाएँ!!!

                             राधाकृष्ण मिरियाला
                   9949707707-9618707707

MAHADEVI VARMA

                                                             Mahadevi Varma


She is a well known Hindi poet of the Chhayavaad generation, the times when every poet used to incorporate romanticism in their poetry. She is more often called the modern Meera. Well, we are talking about the famous Mahadevi Varma, who achieved the Jnanpith award in the year 1982. In this article, we will present you with the biography of Mahadevi Varma, so read on.



Life History

Mahadevi was born in the family of lawyers in 1907 in Farrukhabad, Uttar Pradesh. She completed her education in Jabalpur, Madhya Pradesh. At a young age of nine in the year 1914, she was married to Dr Swarup Narain Varma. She lived with her parents till the time her husband completed his studies in Lucknow. It is during this period that, Mahadevi pursued further education at the Allahabad University. She did her masters in Sanskrit from there.



She met her husband for sometime in the princely state of Tamkoi somewhere around 1920. Thereafter, she moved to Allahabad to further her interest in poetry. Unfortunately, she and her husband mostly lived separately and were busy pursuing their individual interests. They used to meet occasionally. Her husband died in the year 1966. Then, she decided to permanently shift to Allahabad.



She was highly influenced by the values preached by the Buddhist culture. She was so much inclined towards Buddhism that, she even attempted to become a Buddhist bhikshuni. With the establishment of Allahabad (Prayag) Mahila Vidyapeeth, which was primarily set up to impart cultural values to girls, she became the first headmistress of the institute. This famous personality died in 1987.



Writings

Mahadevi Varma is one amongst the other major poets of the Chhayavaadi school of the Hindi literature. She is the epitome of child prodigy. Not only she wrote fabulous poetry, but also made sketches for her poetic works such as Deepshikha and Yatra. Deepshikha is one of the best works of Mahadevi Varma. She is also famous for her book of memoirs.



Notable Works of Mahadevi Varma



Prose

Ateet Ke chalchitra

Kshanda'

Mera Parivaar

Path ke Saathi

Sahityakaar ki Asatha

Sambhashan

Sankalpita

Shrinkhla ki kadiya

Smriti Ki Rekhayen



Poetry

Deepshikha

Himalaya

Neerja

Nihar

Rashmi

Saandhya geet

Saptaparna



Collection

Geetparva

Mahadevi sahitya

Parikrama

Sandhini

Smarika

Smritichitra

Yama



Honors

Her writings were well acclaimed and earned her an important position in the world of Hindi literature. She is believed to be one of the supporting pillars of the Chaayavad movement. Her amazing poetry collection Yama brought her the Gyanpeeth award (1940), the highest Indian literary award. In the year 1956, the Government of India honored her by conferring the title of Padma Bhushan upon her. She was the first Indian woman to become a Fellow of the Sahitya Akademi in the year 1979.

Thursday, March 24, 2011

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को शत शत नमन...

आज के दिन 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव,


राजगुरु हंसते-हंसते लाहौर जेल में फांसी के फंदे पर झूल गए थे। आजाद भारत न उनके सपनों को पंख दे सका

और न उनकी शहादत के मायने समझ सका!



आगरा में नूरी गेट स्थित इस मकान में कभी शहीद भगत सिंह रहे थे! आज यह जर्जर हालत में पड़ा हुआ है!


भगतसिंह की साहस का परिचय इस गीत से मिलता है जो उन्होने अपने छोटे भाई कुलतार को ३ मार्च को लिखा था!


''उसे यह फ़िक्र है हरदम तर्ज़-ए-ज़फ़ा (अन्याय) क्या है

हमें यह शौक है देखें सितम की इंतहा क्या है

दहर (दुनिया) से क्यों ख़फ़ा रहें,

चर्ख (आसमान) से क्यों ग़िला करें

सारा जहां अदु (दुश्मन) सही, आओ मुक़ाबला करें''




                                                               भगत सिंह

जन्म - तिथि: २७ सितंबर, १९०७

जन्म - स्थान: लायलपुर, पंजाब, ब्रिटिश भारत

मृत्यु - तिथि: २३ मार्च, १९३१ (आयु २३)

मृत्यु - स्थान: लाहौर, पंजाब, ब्रिटिश भारत

आंदोलन: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

प्रमुख संगठन: नौजवान भारत सभा, कीर्ती किसान पार्टी एवं हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन

धर्म: सिख धर्म (आरंभीक वर्ष), नास्तिक

प्रभाव राजविप्लव, साम्यवाद, समाजवाद


शहीद भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु जिंदाबाद

सारे जहा से अच्छा हिंदोस्ता हमारा इंकलाब जिंदाबाद




इन शब्दों के साथ "मेरी " बलोग की तरफ से शहीदों को शत शत नमन
(पुण्यतिथि के अवसर पर देश के इन वीर सपूतों को शत शत नमन)

Tuesday, March 22, 2011

ऋषभ देव शर्मा को आंध्र प्रदेश हिन्दी अकादमी का पुरस्कार प्राप्त

                                                                                                         Monday, September 27, 2010
अपने मार्गदर्शक --श्री ऋषभ देव शर्मा जी  को आंध्र प्रदेश हिन्दी अकादमी का पुरस्कार प्राप्त




 आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद [आंध्र प्रदेश] ने हिंदी दिवस की पूर्वसंध्या पर अकादमी भवन में हिंदी उत्सव का आयोजन किया और अच्छी धूमधाम से २०१० के हिंदी पुरस्कार सम्मानित हिंदीसेवियों तथा साहित्यकारों को समर्पित किए. एक लाख रुपए का पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार अष्टावधान विधा को लोकप्रिय बनाने के उपलक्ष्य में डॉ. चेबोलु शेषगिरि राव को प्रदान किया गया. तेलुगुभाषी उत्तम हिंदी अनुवादक और युवा लेखक के रूप में इस वर्ष क्रमशः वाई सी पी वेंकट रेड्डी और डॉ.सत्य लता को सम्मानित किय गया. डॉ. किशोरी लाल व्यास को दक्षिण भारतीय भाषेतर हिंदी लेखक पुरस्कार प्राप्त हुआ तथा विगत दो दशक से दक्षिण भारत में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा के उपलक्ष्य में डॉ.ऋषभ देव शर्मा को बतौर हिंदीभाषी लेखक पुरस्कृत किया गया. इन चारों श्रेणियों में पुरस्कृत प्रत्येक लेखक को पच्चीस हज़ार रुपए तथा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया.



पुरस्कृत लेखकों ने ये सभी पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता शीर्षस्थ साहित्यकार पद्मभूषण डॉ. सी.नारायण रेड्डी के करकमलों से अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ.यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद , आंध्र प्रदेश के भारी सिंचाई मंत्री पोन्नाला लक्ष्मय्या तथा माध्यमिक शिक्षा मंत्री माणिक्य वरप्रसाद राव के सान्निध्य में ग्रहण किए.



इस अवसर पर बधाई देते हुए डॉ. सी नारायण रेड्डी ने साहित्यकारों का आह्वान किया कि हिंदी के माध्यम से आंध्र प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देशविदेश के हिंदी पाठकों के समक्ष प्रभावी रूप में प्रस्तुत करें. डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद ने भी ध्यान दिलाया कि अकादमी का उद्देश्य केवल हिंदी को प्रोत्साहित करना भर नहीं बल्कि हिंदी के माध्यम से आंध्र प्रदेश के प्रदेय से शेष भारत और विश्व को परिचित कराना है.



सम्मान के क्रम में सबसे पहले डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने पुष्पगुच्छ दिया.

और फिर प्रशस्तिपत्र, स्मृतिचिह्न एवं सम्मानराशि प्रदान की गई.

सम्मान ग्रहण करते हुए कवि-समीक्षक ऋषभ देव शर्मा .

भारी वर्षा के बावजूद इस आयोजन में भारी संख्या में हिंदीप्रेमी उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए.

डॉ. सी.नारायण रेड्डी ने अपनी हिंदी ग़ज़ल भी सुनाई -'बादल का दिल पिघल गया तो सावन बनाता है.'

सरकारी आयोजन था.सो, मीडिया वाले भी कतारबद्ध थे.अगले दिन हिंदी, तेलुगु और अंग्रेजी के समाचारपत्रों में तो छपा ही, चैनलों पर भी दिखाया गया.

आंध्र के हिंदीपरिवार की एकसूत्रता औ आत्मीयता पूरे आयोजन में दृष्टिगोचर हुई.

इस बहाने कुछ क्षण मिलजुलकर हँसने-मुस्कराने के भी मिले !!!

                                                                                                  NEWS COLLECTED
                                                                                                             BY
                                                                                              RADHAKRISHNA MIRIYALA....

तेलुगु कविता : अमृत धार అమృత ధార

तेलुगु कविता : अमृत धार అమృత ధార

                                                         By Smt. DR.NEERAJA GKONDA
ఎవరివో నీవు , ఎవరినో నేను

ఎకమైతిమి ఈ వసంతం లో .

ఏది ఏమైనను ......

నా చెమరిన కంఠంపై ముత్యాల హారానివి నీవు.

నా వొనికే పెదవులపై చిలిపి చిరు నవ్వువి నీవు .

నా హృది వీణను మీటి , నవ రస రాగాలను ఆలపించి

నా మదిలో శృంగార భావాలకు ప్రాణం పోసింది నీవు .

రససిక్త మాదుర్యాన్ని చవి చూపించి

నా మోడువారిన జీవితంలో

అమృత ధార వర్షింప జేసింది నీవు .


నా అణువు అణువులో గిలిగింతలు లేపి

నన్ను మైమరిపించింది నీవు

నా ప్రతి స్పందనలోను అనురాగాన్ని నింపి

ఓంకారం పలికించింది నీవు .
 
 
तेलुगु कविता : अमृत धार

                                                     श्रीमती .डा.नीरजा जी .....
ऎवरिवो नीवु , ऎवरिनो नेनु

ऎकमैतिमि ई वसंतं लो .

एदि एमैननु ......


ना चॆमरिन कंठंपै मुत्याल हारानिवि नीवु.

ना वॊनिके पॆदवुलपै चिलिपि चिरु नव्वुवि नीवु .

ना हृदि वीणनु मीटि , नव रस रागालनु आलपिंचि

ना मदिलो शृंगार भावालकु प्राणं पोसिंदि नीवु .


रससिक्त मादुर्यान्नि चवि चूपिंचि

ना मोडुवारिन जीवितंलो

अमृत धार वर्षिंप जेसिंदि नीवु .



ना अणुवु अणुवुलो गिलिगिंतलु लेपि

नन्नु मैमरिपिंचिंदि नीवु

ना प्रति स्पंदनलोनु अनुरागान्नि निंपि

ओंकारं पलिकिंचिंदि नीवु .

Sunday, March 20, 2011

पंडित माखन लाल चतुर्वेदी --पुष्प की अभिलाषा

                          पुष्प की अभिलाषा
                                     पंडित माखन लाल चतुर्वेदी


भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य

                                    भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य


आजकल भारत में ‘भविष्य की हिंदी व हिंदी का भविष्य’ को लेकर बहुत सी परिचर्चाएं, गोष्ठियों व कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है।

अपनी भाषा को लेकर जो गर्व, जो उत्साह होना चाहिए उसकी हम भारतीयों में बहुत कमी है। हम हिंदी के ऩाम पर भाषणबाजी तो खूब करते हैं पर उतना श्रम और कर्म नहीं करते। हिंदी की सरकारी दावत तो खूब उड़ाई जाती है पर शिरोधार्य तो अँग्रेजी ही है।
हमारा नेता, हमारा लेखक और बुद्धिजीवी-वर्ग हिंदी की दुहाई तो बहुत देता है परन्तु अपने कुल-दीपकों को अँग्रेजी स्कूलों और विदेशों में ही शिक्षा दिलवाना चाहता है। ‘हाथी के दांत, खाने के और दिखाने के और।’

हमें अँग्रेजी बोलने, पढ़ने-लिखने और अँग्रेजियत दिखाने में अपना बड़प्पन दिखाई देता है किंतु सच तो यह है कि यह हमारी मानसिक हीनता ही है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने स्वदेश-प्रेम, स्वभाषा और स्व-संस्कृति की गरिमा पर जोर देते हुए कहा है-

निज भाषा उन्नति अहै; सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रविन।

पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

अँग्रेजी पढ़िए, जितनी और अधिक भाषाएं सीख सकें सीखें किंतु अपनी भाषा को हीन करके या बिसराने की कीमत पर कदापि नहीं।

           जय हिंदी ----- जय जय हिंदी ।। ।। ।।  
                                                         

डॉ. सुधांशु चतुर्वेदी

डॉ. सुधांशु चतुर्वेदी के साहित्य-सृजन की हीरक जयंती पर हमारा शत-शत नमन॥
         और कुछ विशेषताओं के लिए श्री सुधांशु की इस वेब में देख सकते हैं॥॥              
                             http://sudhanshuchaturvedi.com/ 

Friday, March 18, 2011

होली की खुब सारी शुभकामनाये........



रंग के त्यौहार में                                                                                                     


सभी रंगों की हो भरमार


ढेर सारी खुशियों से भरा हो आपका संसार


यही दुआ है हमारी भगवान से हर बार।

आपको और आपके परिवार को होली की खुब सारी शुभकामनाये इसी दुआ के साथ आपके व आपके परिवार के साथ सभी के लिए सुखदायक, मंगलकारी व आन्नददायक हो। आपकी सारी इच्छाएं पूर्ण हो व सपनों को साकार करें। आप जिस भी क्षेत्र में कदम बढ़ाएं, सफलता आपके कदम चूम......


                                  होली की खुब सारी शुभकामनाये........

                                                                                               आप का
                                                                                   राधा कृष्ण मिरियाला  

भारतीय साहित्य : नारीवादी चेतना

               भारतीय साहित्य : नारीवादी चेतना
                                                                                                          राधाकृष्ण.मिरियाला

                                        पुरुष प्रधान समाज में स्त्रीयों का दमन कोई नयी बात नहीं है आरम्भ    से ही स्त्री कुंताये लिए जाती आ रही है उसकी इच्छाओं,  आशाओं, आकांक्षाओं , का सदा से हे दमन होता आ रहा है

कई विद्वानों , मनीषियों जैसे गांधीजी के कुशल मार्गदर्शन एवं अनथक प्रयासों के चलते स्त्री ने अपनी शक्ती को पहचाना एवं समाजके विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान स्थापित की
'मनुस्मृति' में कहा गया है -----
                        "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता

                          यत्रोतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वस्तात्राफलता: क्रिया:"

मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में --"संसार में जो सत्य है सुंदर है मैं उसे स्त्री का प्रतीक मानता हूँ
                       " जयशंकर प्रसाद की ' कामायनी ' में कहते हैं -

                                 "नारी तुम केवल श्रद्दा हो ,

                                 विश्व रजन नभ -पग-तल में

                                 पीयूष स्रोत सी बहा करो

                                जीवन के सुंदर समतल में "

इस प्रकार हमारे साहित्यकारों ने समाज में स्त्री का स्टार बहुत ऊंचा माना है
इसलिए साहित्य जगत में सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा इनको आधुनिक ' मीरा ' कहा जाता है
अमृत प्रीतम जैसी साहित्य का पर्याय बन चुकी है

समय व समाज के परिवर्तन के साथ-साथ नारी की मात्रु-सत्तात्मक अधिकार का उन्मूलन ,पुरुष का उस पर अधिकार व सामाजिक स्वेच्छार की त्रासदी की विडम्बना नारी को झेलना पडा
शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी ' नारी का मूल्य ' पुस्तक में कुरैश के लोगों के द्वारा अपनी कन्याओं का , मक्का के समीप अबूदिलाया पहाड़ पर वध किया जाने का उल्लेख किया है
वैदिक युग में स्त्री की स्तिथि बहुत ऊंची थी। ऐसा कहा जा सकता है की भारतीयों के सभी आदर्श स्त्री रूप में पाये जाते हैं । विध्या का आदर्श 'सरस्वती' में, धन का 'लक्ष्मी' में शक्ती का 'दुर्गा' में, सौन्दर्य का 'रति' में, पवित्रता 'गंगा' में, इतना ही नहीं सर्वव्यापी इश्वर को भी ' जगतजननी ' के नाम से सुशोभित किया गया है । उस युग में चाहे घर हो या परिवार , हर जगह नारी की स्थिति बहुत ही अच्छी थी ,वह बहुत आगे थी। 'यजुर्वेद' में ' सोमपुष्टा ' कहा गया है । बालिकाओं के लिए सिख्स ग्रहण करना उतना ही आवश्यक था जितना बालकों के लिए बाल विवाह की प्रथा नहीं थी ।

                    'पूर्ण ब्रह्मचार्येण कन्या युवानान विन्दते पतिम ।'
                                                                                                        (अथर्ववेद - ११/१५/१८)


आत्मिक विकास की दृष्टी से भी स्त्रीयां पुरुषों के साथ एक ही क्षेत्र में विचरण करती थी ।

आद्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ धार्मिक क्षेत्र में भी स्त्री का पुरुष के बराबर ही अधिकार था । रामचन्द्रजी के द्वारा किये गए राजसूय यज्ञ में सीताजी की उपस्थिति बहुत आवश्यक थी । इसलिए स्वर्णमूर्ती को उनके स्थान पर रख कर यज्ञ की पूर्ती की गयी ।स्वयं ब्रह्मा

ने स्वीकार किया है की देवी ही इस ब्रह्माण्ड को धारण करती है । 'अथर्ववेद ' में स्त्री को साम्रज्ञ्नी का नाम दिया गया है । भारत के मध्यकाल में भी स्त्रीयों के अगाध पंडिता होने के दृष्टांत पाये जाते हैं । जिस समय शंकराचार्य ने अपने समय के प्रकांड मंडन मिश्र को परस्त कर दिया उस समय उसकी स्त्री विद्याधरी ने शंकराचार्य को कामासास्त्र विषय में परास्त किया । स्त्री का यह युग भारत के इतिहास का स्वर्ण युग कहा जा सकता है । एक विद्वान का कथन है कि यदि किसी देश के सांस्कृतिक स्टार का पता लगाना है तो पहले या देखो कि स्त्रीयों की अवस्था कैसी है ।

                 महाभारत काल विरोधाभासों से पूर्ण है । वहाँ नारी सम्मान का पात्र भी है । और सब पापों का जड़ भी ।बौद्द साहित्य व जातक कथाओं में नारी को सार्वजनिक उपयोग की वस्तुके रूप में चित्रित किया गया है आगे चलकर रीतिकाल व मुसलामानों के आगमन से जो गीत,मुक्तक, सवैयें, कवित्त कुंडलियों में नारी सौन्दर्य प्रेम के मांसल चित्रण व नारी स्थिति का चित्रण किया गया, उससे नारी लौकिक सौन्दर्य सम्पन्ना भोग्या मानी गयी ।

यह दुःख की बात है कि आधुनिक काल तक आते-आते स्त्री के दिव्यगुण धीरे-धीरे उसके अवगुण बनने लगे।साम्राज्ञी से वह धीरे-धीरे आश्रित बन गयी ।नारी की सामाजिक स्थिती अपने पतन की चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी ।

वैदिक युग का दृष्टिकोण जो स्त्री के प्रति दिव्य कल्पनाओं तथा पुनीत भावनाओं से परिवेष्टित था अब पूर्णतया बदल चुका था ।यह युग तो जैसे स्त्रीयों की गिरावट का युग था।उनके मानसिक तथा आत्मिक विकास के द्वार पर ताला लगा दिया गए।

उनकी साहित्यिक उन्नति के मार्ग पर अनेकों प्रतिबन्ध लगा दिए गए। 'स्त्री शूद्रो नाधीयातम ' जैसे वाक्य रच कर उसे शूद्र की कोटि में रख दिया ।स्त्री को संस्कार के अतिरिक्त और सभी संस्कारों से वंचित कर दिया।

                            18 वीं शताब्दी में स्त्रीयों की हालत जितनी खराब थी उसमे 19 वीं सदीमें कुछ सुधार आया धार्मिक आडम्बर ,रूढीगत विचार जैसे अंधविश्वासों का बोलबाला चारों तरफ इस प्रकार निर्मित कर दिया था कि उसे तोड़ सकना सहज संभव नहीं था। इस बर्बर के प्रति प्रति क्रिया स्वरुप राजा राममोहन राय हमारे सामने आये जो नारी वकालत लगातार करते रहे ।नारी पर होनेवाले अनेक सामाजिक अत्याचारों को उन्होंने ख़तम किया और स्त्री सिक्षा का आरंभ किया।
द्विवेदी युग में सुधारवादी आंदोलनों के माध्यम से कवि का ध्यान नारी -अस्मिता की ओर आकर्षित हुआ और पुरुष की साझीदार नारी अपने सम्पूर्ण मानसिक एवं आध्यात्मिक सौन्दर्य के साथ काव्य का विषय बनी। इस युग के साहित्यकार राम नरेश त्रिपाटी , हरिऔद , मैथिली शरण गुप्त ने नारी के प्रति इसी दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। नयी कविता तक आते-आते नारी हर क्षेत्र में पुरुषों की बराबरी करने लगी थी। डा.हरिचरण शर्मा की दृष्टि में -आज नारी दलित द्राक्षा के सामान निचुड़ भले ही जाय किन्तु पुरुषों को भी पूर्णतः निचोड़ने में विश्वास करती है। नारी जीवन की अनेक समस्याओं और अनेक प्रशनों को इस काल के साहित्यकारों ने साहित्य का विषय बनाया।

                                   आज नारीवाद वैश्विक्वाद बनगया है जिसके माध्यम से विश्व की नारियाँ व उनकी समस्याएँ आपस में जुडी हुई हैं। इस के द्वारा सहस्राब्दियों से अपने प्रति होते आये अत्याचार व प्रताड़नाओं के विरोध में नारी को अपनी आवाज़ ऊँची करने का अवसर मिला है । भारतीय साहित्य की मुख्य विधाओं में नारीवाद के प्रतिपादन द्वारा जीवन के आर्थिक, राजनीतिक, सामजिक,व्यावहारिक ,शैक्षिक,औद्योगिक आदी क्षेत्रों में नारी सक्रीय भागीदारी बढ़ रही है। नारीवाद 'नारी के सामान भागीदारी से समाज का पुनर्निर्माण ' चाहता है। आज के नारीवादी साहित्य नारी की इच्छाओं -आकाँक्षाओं का दस्तावेज है । नारी की योग्य ,मोहिनी,यथार्थवादी दृष्टि अब अज्ञेय, धर्मवीर प्रसाद, शांता सिन्हा, शकुंतला माधुर,कीर्ती चौदरी की कविताओं में विकसित है-

                                       "फूल को प्यार करो

                                        झरे तो झर जाने दो ,

                                       जीवन का रस लो

                                       देह मन आत्मा की रसना से

                                      जो भरे उसे भार्जाने दो।"                                 -अज्ञेय ...

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी की पहली कहानी के रूप में जिन कहानियों की चर्चा की है उनमें एक लिखिका की कहानी 'बंगमहिला' की 'दुलाईवाली' है ।

बंगमहिला हिंदी की प्रथम कहानी-लेखिका है । यह रचना सन 1907 में की थी । यह कहानी एक हास्य-कथा है जिसमें नारी की स्थिति का वर्णन हुआ है। छायावादी कालमें यदि सुभद्रा कुमारी चौहान ,महादेवी वर्मा को स्त्री-कविता परिवृत्त बड़ा करने का श्रेय है तो छायावादोत्तर काल में जो स्त्री-स्वर उभरें उनमें विशेष हैं - अमृता भारती, शकुन्त माथुर , ज्योत्स्ना मिलन, कांता-चौदरी ,सुनीता जैन, इंदु जैन,मोना गुलाटी ,अर्चना वर्मा आदी ।

                  20 वीं शताब्दी में कहानियों में समाज की निर्दयता व क्रूरता का जीवंत चित्रण मिलता है।
नारी चित्रण त्याग और सेवा की प्रतिमूर्ति के रूप में हुआ है । इस समय की प्रमुख कहानी लेखिकाएँ श्रीमती विमला देवी चौदरानी, विद्यावती ,राजरानी देवी, चन्द्रप्रभा देवी महरोत्रा , जनकदुलारी देवी , श्रीमती मनोरमा देवी आदि हैं।

                             नए उपन्यासकार नारी के सन्दर्भ में उसके समकालीन जीवन बोध की अपेक्षा उसके यौन-ग्रसित पक्ष को प्रस्तुत करने में सक्रीय रहे हैं । मृदुला गर्ग का उपन्यास 'चितकोबरा' फनीश्वरनाथ रेणु 'प्लूट बाबू रोड' , नागर का 'नाच्यो बहुत गोपाल' , मन्नूभंडारी का 'आपका बंटी' कृष्ण सोबती का 'सूरजमुखी अँधेरे के ',महेंद्र भल्ला का 'एक पति के नोट्स ',ममता कालिया का 'बेघर' नारी पुरुष के भावहीन संबंधों को उदघाटित करते हैं ।
                 
                               पंडित नेहरु ने भी 'हिन्दुस्थान की समस्याएँ' में नारी की समस्या को प्रमुख मानकर लिखा है-
                            "पुरुषों से मैं कहता हूँ कि तुम स्त्रीयों को अपने दास्यत्व से मुक्त होने दे , उन्हें अपने बराबर समझो उन्हें अपने बराबर समझो उन्हें अपने बराबर समझो ।"

पन्तजी कहा --- "मुक्त करो नारी को मानव

                            चिरावंदिनी नारी को

                            युग-युग की बर्बरता से

                            जननी सभी प्यारी को ।"

आज के नए उपन्यासों और कहानीकारों की द्रिश्तीमें नारी युगबोध, भाव बोध बदल गया है।पारंपरिक मूल्यों के विरुद्ध संघर्ष करती हुई 'Angry Women' मानसिकता ही हिंदी की समकालीन कहानी में व्यंजित हुई है।प्रेमचंद ने अपनी उपन्यासों में नारी का चित्रण ऐसे किया कि सामाजिक अंधविश्वासों के प्रति प्रतिघटित करती है ।उदाहरण-गोदान में 'धनिया' का पात्र मोहन राकेश की 'मिस-पाल', राजेन्द्र यादव की 'छोटे-छोटे-ताजमहल ',उषा प्रियंवदा की 'नागफनी के फूल' ममता कालिया का 'नितांत निजी ' में समकालीन नारी चेतना , नारी जीवन का यथार्थ उभर कर आया है।

                               मलयालम साहित्य के कवी के .वी. शंकर पिल्लै ने भी अपनी कविता में नारी के प्रति सहानुभूथी झलकाई है-------

                                           उर्मिला/तुम्हारे सघन घुंघराले बाल/लम्बी बाहें / लाल-लाल अधर /और तुम्हारे छोटे-छोटे स्तन /वसंत ऋतु के बीतते-बीतते /उभर आती तुम्हारी सिसकियाँ /मैं फिर एक बार /भूलने को मजबूर हो गया हूँ।


                      कन्नड़ महिला लेखिकाओं में वीणा-शांतेश्वर का नाम प्रमुख है। इनकी कहानियों में चित्रित आज की महिला की पीड़ा और उसके भीतर धीरे-धीरे पनपनेवाले स्वाभिमान की दुनिया है। पुरुष वर्ग द्वारा किये गए अन्याय और शोषण का चित्रण इनमें होने के बावजूद कहीं भी नारी -स्वातंत्र्य के आन्दोलन जैसी नारेबाजी इनमें दिखाई नहीं पड़ती है। स्थिति को तटस्थ होकर देखने के कारण इनमें एकपक्षीयवाद सुनायी नहीं पड़ता है और इसलिए ये कहानियाँ अधिक प्रभावशाली है।

                            तेलुगु के प्राचीन महान कवि वेमना अपनी रचनाओं में स्त्री पर जो अत्याचार हो रहे हैं उसके प्रति अपनी कविताओं के जरिये खंडन किया।उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से नारीवादी चेतना में सहयोग नहीं दिया। परन्तु अपना रचना द्वारा स्त्री जाति पर हो रहे अन्यायों के प्रति अपनी आवाज़ उठाई । स्त्री के प्रति प्रेम भावना तथा जीवंविधानों पर प्रकाश डाला।
                                                    आधुनिक युग के तेलुगु कवी सुरवरं प्रताप रेड्डी ने कहा कि ----"प्राचीन काल से हिन्दू समाज का चरित्र है ।" सुरवरंएक अभुदयावादी कवि हैं ।उन्होंने अपनी रचनाओं में नारी को महत्वपूर्ण स्थान दिया । तेलुगु में गद्य तिक्कन्ना नाम से प्रसिद्द गुराजादा अप्पाराव तथा दक्षिण भारत के नारी जनोद्दरक वीरेशलिंगम पन्तुलु आदि महापुरुषों ने नारीवादी चेतना के प्रति आन्दोलन छेड़ा और वह सफल भी हुए ।तेलुगु साहित्य के आधुनिक काल में नारी के प्रति सहानुभूति व्यक्त करनेवालों में श्री कन्दुकूरी वीरेशलिंगम पन्तुलु, गुराजाड़ा अप्पाराव , गुडिपुदी. वेंकटाचलम, गोपीचंद, कोदवातीगंटी कुटुम्बराव आदि प्रमुख हैं।आधुनिक युग की स्त्री लेखिकाएँ -इल्लंदल सरस्वती देवी, श्रीदेवी,वासीरेड्डी सीतादेवी आदि गद्य व कथा साहित्य से जुडती हैं तो जयप्रभा .सावित्री ,विमल कोंदापूदी निर्मला आदि काव्य क्षेत्र से जुडी हैं। इनमें जयप्रभा ने अपने काव्य-संग्रह 'सूर्युदु कूड़ा उदयिस्ताडु ' , 'वामनुडि मूड़ोपादम ' "इक्कड कुरिसिना वर्षाम एक्कड़ी मेघानिदी" 'यशोधरा ई वगापेंदुके' आदि में नवीन शब्द ,बिम्ब, प्रतीक और भाषा के माध्यम से पारंपरिक नारी का तिरस्कार ही नहीं करती बल्कि नारीवाद की स्पष्ट अभिव्यक्ती करती हैं । कोंडापूड़ी निर्मला के 'संदिग्ध संध्या '' "नडिचे " , "गेयालू " आदि काव्य संग्रह भी नारीवादी विचारधारा से ओताप्रेत है ।समसामयिक कवी शिवसागर का 'चेल्ली चन्द्रम्मा'  गद्दार का "सिरिमल्ले चेट्टूकिन्दा "  उल्लेखनीय हैं।

                      नारीवादी की दृष्टी से तेलुगु के उपन्यासों का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। तेलुगु में नारीवादी साहित्य का नाम लेते ही औलगा का नाम स्मरण आये बिना नहीं रहता । औलगा नारी की सम्पूर्ण स्वेच्छा की प्रबल दावेदार हैं । उनका उपन्यास 'स्वेच्छा' में नारी को सम्पूर्ण स्वेच्छाकान्क्शी के रूप में चित्रित किया है जो नारीवाद की नींव है । इसके बाद औलगा की' सहजा', ' आकाशम लो सगम 'आदि उपन्यासों में भी नारीवाद का शाशाक्त-चित्रण मिलता है । औलगा के बाद मल्लादी सुब्बम्मा का नारी -स्वेच्छा की प्रबल समर्थक के रूप में लिया जाता है । ' वंशाम्कुरम ' , ' कन्नीटि केरटाल वेन्नेले ', 'जीवितगम्यम ' ,'मानवी ' आदि में नारी मुक्ति तथा आर्थिक स्वावलम्बिता का चित्रण मिलता है ।

                                   औलगा की कहानी संग्रह ' राजकीय कथलु ' में भी नारी के मौलिक अधिकारों के हनन के विरोध में लेखिका की अभिव्यक्ति अत्यंत स्पष्ट है । २० वीं सदी के अंतिम दशक में जयधीर तिरुमाला राव के संपादकत्व में 'स्त्रीवाद -कथलु ' 1993 अब्बूरीछाया देवी , तुरगा जानकी रानी , आदी लेखिकाओं ने अपनी कहानी के माध्यम से नारीवाद का झंडा पहराया । आज स्त्रीवादी लेखन के माध्यम से भी नारीवादी चेतना प्रतिध्वनित हो रही है । पश्चिम में वर्जीनिया वूल्फ , मरीना स्वेतएवा, अन्ना अखमतोवा , सिल्विया प्लैथ, ऐन सेक्सटन कवयित्रियाँ अपनी विशिष्ट भाषा -शैली में नारी - चेतना को उजागर कर रही है । समकालीन स्त्री-कवियों में -आसिवासी कवि निर्मला - पुतुल , शुगुफ्ता खान , विस्थापित कश्मीरी -कवयित्री क्षमा-कौल , अनीता वर्मा, मधु शर्मा, नीलेश रघुवंशी , शुभा, कात्यायनी, अनामिका , निर्मला गर्ग व सविता सिंह ,गगन गिल ,तेजि ग्रोवेर आते हैं जिन्होंने स्त्री-संसार के विशिष्ट अनुभव-वृत्तों का सजग आकलन किया है ।

                                           नारीवाद वैश्विकवाद है । यह विश्व की नारियों को और उनकी समस्याओं को आपस में जोड़ने का प्रयास करता है। नारीवाद एक जीवन-दर्शन है ; एक आन्दोलन है जिसके अंतर्गत सभी प्रकार के शोषण विशेषकर नारी-शोषण का विरोध किया जाता है । समाज में समानता तभी स्थापित होगी जब नारी व पुरुष एक दूसरे के अस्तित्व को सम्मान देंगे । BELL HOOKS ने अपनी पुस्तक Activist &Feminist में लिखा है - When Women and Men understand that working to eradicate patriarchal domination is a struggle rooted in the longing to make a world where everyone can live fully and freely,then we know our work to be a gesture of love.let us draw upon that lov to heighten our awareness ,deepen our compassion, intensify our courage and strengthen our commitment.....