Sunday, May 1, 2011

सुसंपन्न अज्ञेय जन्मशती समारोह!!!


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के 
'साहित्य संस्कृति मंच ' 
और  
स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को 
    "अज्ञेय जन्म शती समारोह"
  धूम-धाम से मनाई गयी है !
चित्रावली 







समारोह  में मुम्बई से मुख्य अतिथि के रूप मे आए प्रो त्रिभुवन राय ने उद्घाटन भाषण दिया ! उनकी बातों में..... 

        PART-1




PART-2




PART-3










पूरी रिपोर्ट यहाँ पढी जाती है !!!!
ऋषभ उवाच: दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में अज्ञेय जन्मशती समारोह संपन्न

                                                                                                              




सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन `अज्ञेय'



(१९११-१९८७)

जन्म : ७ मार्च १९११ को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में ।

शिक्षा :
प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पिता की देख-रेख में घर पर ही संस्कृत, फारसी, अँग्रेज़ी और बँगला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ। १९२५ में पंजाब से एंट्रेंस, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से विज्ञान में इंटर तथा १९२९ में लाहौर के फॉरमन कॉलेज से बी एस सी की परीक्षा पास की। एम ए़ में उन्होंने अँग्रेज़ी विषय रखा, पर क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण पढ़ाई पूरी न हो सकी।

कार्यक्षेत्र :
१९३० से १९३६ तक विभिन्न जेलों में कटे। १९३६-१९३७ में `सैनिक' और `विशाल भारत' नामक पत्रिकाओं का संपादन किया। १९४३ से १९४६ तक ब्रिटिश सेना में रहे, इसके बाद इलाहाबाद से `प्रतीक' नामक पत्रिका निकाली और ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी स्वीकार की। देश-विदेश की यात्राएँ कीं, 'दिनमान' साप्ताहिक, `नवभारत टाइम्स', अँग्रेज़ी पत्र `वाक्' और `एवरीमैंस' का संपादन किया।

पुरस्कार :
१९६४ में `आँगन के पार द्वार' पर उन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और १९७९ में 'कितनी नावों में कितनी बार' पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।

प्रमुख काव्य रचनाएँ :
कविता संग्रह : हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए थे, आंगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, सागर-मुद्रा, सुनहरे शैवाल और सागर मुद्रा इत्यादि उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने साहित्यिक गद्य के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्य किये
।

Wednesday, March 30, 2011

नामवर सिंह जी के एक विडियो !!!

नामवर सिंह जी के एक विडियो !!!

भारतीय उपन्यास की अवधारणा




डा. नामवर सिंह के साथ  राधाकृष्ण मिरियाला

"शमशेर शताब्दी समारोह " संपन्न



शमशेर बहादुर सिंह
शमशेर की रचनात्मकता का लक्ष्य है - अपने आपको देख पाना। इनकी 'बात -बोलेगी' कविता इस तथ्य का उदाहरण है -



बात बोलेगी

हम नही

भेद खोलेगी

बात ही।

सत्य का

क्या रंग

पूछो,एक रंग

एक जनता का दुःख एक

हवा में उड़ती पताकायें अनेक

दैन्य दानव । क्रूर स्थिति ।

कंगाल बुद्धि : मजदुर घर भर

एक जनता का अमर वर :

एकता का स्वर

अन्यथा स्वातंत्र इति।






                       एवं                     

के संयुक्त तत्वावधान में
"शमशेर शताब्दी समारोह " 

"शमशेर शताब्दी समारोह चित्रावली"

Get your ओवन
मार्च ३० समशेर शताब्दी की चित्रावली 

 "शमशेर शताब्दी समारोह " की स्थूल रूप से रिपोर्ट यहाँ पढी जा सकती है! 

"शमशेर शताब्दी समारोह "


 मार्च ३१ समशेर शताब्दी की चित्रावली

Tuesday, March 29, 2011

डा. ऋषभदेव शर्मा जी के द्वारा कविता शिक्षण की व्याख्यान !!!

                      *** कविता शिक्षण ***
साहित्य - शिक्षण के पाठ्यबिंदु :

                                                                                                          डा. ऋषभ देव शर्मा ...
   डा. ऋषभदेव शर्मा जी के द्वारा कविता शिक्षण की व्याख्यान !!!  
 ( दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रशिक्षण महाविद्यालय में )

(क)
             * साहित्यिक पृष्ठभूमि : 6
              * साहित्यिक रूढ़ियाँ तथा - समीक्षात्मक प्रतिमान : 5
              * साहित्यिक कृति : 4
(ख)
              * साहित्यिक कृति का गठन : 3
              * साहित्यिक कृति की बुनावट : 2
              * साहित्यिक कृति की भाषा : 1


         साहित्यिक कृति की वाचनगत विशिष्टता :
दो स्तर :
             * शब्दार्थ बोधक वाचन
             * साहित्यार्थ बोधक वाचन
  भाषा के रूप पर प्रायोगिक बिंदु
            * अपेक्षया अधिक अपरिचित शब्द
     (सामान्य शब्द ,पारिभाषिक शब्द,सांस्कृतिक शब्द )
            * विशिष्ट सह प्रयोग
(भाषिक सह प्रयोग, रूढ़ लाक्षणिक प्रयोग,-मुहावरें आदि )
            * सूक्ति


            * विशिष्ट प्रसंग
(पूरा कथा,इतिहास,भूगोल से सम्बंदित आदि )
          
            * व्याकरणिक विशेषताएँ
  (संरचनात्मक आदि)


कृति की बुनावट के स्तर पर

विशिष्ट साहित्यिक प्रभाव के निष्पादक


उपकरण--
                 शब्दालंकार,
                 अर्थालंकार,
                 प्रयोजनमूलक लाक्षणिक प्रयोग,
                 बलात्मक चयन,
                 विचलित प्रयोग आदि .


                 कृति के गठन के व्यापक स्तर पर : 
               बिम्ब,
                    कथावस्तु ,
                    चरित्र  ,
                   समग्रानुभूति आदि..


साहित्यिक रूढ़ियों की कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :
* कथावर्णन के प्रकार
(संवाद शैली, आतंरिक एकालाप शैली , पात्र शैली,सामान्य वर्णनात्मक शैली )

       * चरित्र चित्रण की पद्दतियाँ
(पात्रों का विशिष्ट नामकरण, प्रत्यक्ष चित्रण, परोक्ष चित्रण )
 भाषा समुदाय की सांस्कृतिक पृष्टभूमि :

यहाँ संस्कृति का व्यापक अर्थ अभीष्ट है


इस में भाषा-समुदाय का सारा भौतिक ,भावात्मक ,बौद्दिक ,विश्वासपरक, तथा सामाजिक
 समीक्षात्मक प्रतिमान का प्रसंग
समीक्षात्मक भाषा (शब्दावली तथा वाक्य विन्यास) एवं उससे अभिव्यक्त व्यंजनायें


हर  भाषा में साहित्य समीक्षा की भाषा में कुछ अंतर दिखाई पड़ते है जो प्रायः निम्न लिखित कोटियों में होते है


पारिभाषिक शब्द तथा मूल्यांकनपरक शब्द ..


हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
                                                                                                             - जयशंकर प्रसाद 
                                            कविता पाठ

तुम कनक किरण के अंतराल में

लुक चिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गर्व वहन करते
यौवन  के घन , रस खान ढरते

हे लाज भरे सौदर्य बता दो

मौन बने रहते हो क्यों ?

अधरों के मधुर कगारों में

कल-कल दवानी के गुन्जारों में

मधु सरिता सी यह हंसी तरल

अपनी पीते रह्ते हो क्यों ?

बेला विभ्रम की बीत चली

रजनी गंधा की कली खिली


भाषा स्तरीय पाठ बिंदु

विशिष्ट शब्दों का अर्थ


* कनक - स्वर्ण,सोना; लुक छिपकर-बहुत गुप्त रूप से ; घन-घना; कन - कण; ढरते - लुढ़कते , बहते ; कगार - ऊँचा किनारा ;  विभ्रम - अस्थिरता,उत्कंठा ; बेला - समय,घड़ी;
मलय-आकुलित - (चन्दन पर्वत को स्पर्श कर आनेवाले) पवन के सामान चंचल; दुकूल-रेशमी वस्त्र ;
कलित -विभूषित



बनावट स्तरीय पाठ्य बिंदु
लाक्षणिक प्रयोग :
लाज भरा सौंदर्य = लज्जाशील सुंदर नारी ; कनक किरण का अंतराल = स्वर्णिम छठा .

विशिष्ट चयन : 
लुक छिपकर = लज्जा की कोमलता का अभिव्यंजक शारीरिक व्यापार ;विभ्रम की बेला =प्रिय मिलन की आतुरता को प्रकट करने वाली अभिव्यक्ति .

सादृश्य - विधान की अभिव्यक्तियाँ :
अधरों का मधुर कगार = ओठ रूपी ऊंचे किनारे ; सांध्य मलय-आकलित =संध्याकालीन मलय

गठन स्तरीय पाठ्य बिंदु
* बिम्ब
* चाक्षुस बिम्ब
गुण-कोमलता /माधुर्य

                    साहित्यिक भाषा स्तरीय पाठ्य बिंदु :

* नारी सौन्दर्य वर्णन की छायावादी परंपरा के अनुसार चरम सौंदर्य का मधुर प्रभावपरक तथा स्थूल का सूक्ष्म रूप में वर्णन .

* मानव सौंदर्य के वर्णन में प्रकृति के उपकरणों का पृष्टभूमि  के रूप में अथवा अभिव्यक्ति -वैशिष्ठ्य  के अंग के रूप में वर्णन .

सम्बोधानात्मकता

 समीक्षात्मक भाषा सतरीय पाठ्य बिंदु
    समीक्षात्मक भाषा विभिन्न भाषाओं के साहित्य की अपनी-अपनी रूढ़ियाँ होती हैं .
* पारिभाषिक शब्द -निर्देशात्मक :
लाज भरा सौंदर्य = लाक्षणिक प्रयोग; अधरों का मधुर कगार =रूपक अलंकार ; मधु सरिता सी यह हंसी = उपमा अलंकार ;तरल हंसी = विशेषण वक्रता ; सांध्य मलय -आकुलित = उपमा अलंकार .

* निष्कर्ष - स्तरीय मूल्यांकन परक शब्दावली :
 नारी सौंदर्य का कोमल , सात्विक-रोमानी चित्तरंजक ,तथा प्रधानतया लाक्षणिक शैली में अलंकृत वर्णन . श्रेष्ट शब्द चयन तथा संगीतात्मक वर्ण विन्यास का उदहारण .
सम्बोधानात्मकता से काव्योचित रोमानीपन की निष्पत्ति .
छायावादी काव्यदारा का स्तरीय नमाना 'प्रसाद' की....

* साहित्य- शिक्षण में लक्ष्य -भाषा (जिस भाषा में साहित्यिक रचना रची गयी है ) तथा निरूपक भाषा (साहित्यिक रचना की समीक्षा के लिए प्रयुक्त भाषा ),दोनों ही पाठ्य बिंदु हैं .

* वास्तविक शिक्षण व्यापार में इन दोनो का  मिश्रित  व्यवहार  ही होता है- लक्ष्य भाषा केंद्र में रहती है , निरूपक भाषा  परिधि  पर  . विशेष बात यह है की भाषा प्रयोग के इन  दो  प्रकार्यात्मक  भेदो की हमें चेतना हो .

सन्दर्भ 

* प्रो. सुरेश कुमार, साहित्य शिक्षण के पाठ्यबिंदु (आलेख ), साहित्य भाषा और साहित्य शिक्षण 
      (१ ९९२ -उच्च शिक्षा और शोध संस्थान , 
      दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास ),
            पृष्ट : २६७-२७७  







डा. ऋषभदेव शर्मा जी के द्वारा कविता शिक्षण की व्याख्यान !!!
(यह विडियो में कुछ अंश छूट गए है लेकिन हमारें सर का हर एक पॉइंट भी हमारे लियें अमूल्य है इसीलिए जो विडियो मिला है उसी को एडिट कर दिया गया है( for B.Ed trainees& HPT Trainees))

  

Friday, March 25, 2011

महादेवी वर्मा जन्म दिवस की शुभ कामनाएँ 26-03-1907

महादेवी वर्मा


(1907-1987)



जन्म :  २६ मार्च १९०७

स्थान : फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश )

पिता : गोविन्द सहाय वर्मा

प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए.,

भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण ,ज्ञानपीठ पुरस्कार

रचनाएँ : नीहार, रश्मि ,संध्या गीत ,दीप शिखा ..........


महादेवी वर्मा की एक कविता 'नीहार' से!


  जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करुणा कितने सन्देश

पथ में बिछ जाते बन पराग ;

गाता प्राणों का तार तार

अनुराग भरा उन्माद राग ;

आँसू लेते वे पद पखार !

हँस उठते पल में अर्थ नैन

धुल जाता ओंठों  से विषाद,

छा जाता जीवन में वसंत

लूट जाता चिर संचित विराग ;

आँखें देतीं सर्वस्व वार !!!!


महादेवी वर्मा छायावाद के आधार स्तंभों  में से एक  हैं । अज्ञात  प्रियतम  के प्रति  वेदना  भाव की अभिव्यक्ति उनके काव्य में प्रमुखता से हुई।वेदना और करुणा की प्रधानता के कारण महादेवी जी को आधुनिक मीरा कहा जाता हैं ।अज्ञात प्रियतम के प्रति विरह वेदना की भावना के कारण ही उनकी काव्य में रहस्यवाद की प्रमुखता हैं  उनकी कृतियाँ ---नीहार,रश्मि ,नीरजा,सांध्यगीत एवं दीपशिखा में सर्वत्र वेदना व्याप्त हैं।

इस प्रकार महादेवी के काव्य में वेदना तत्व हैं।

इतना ही नहीं इनके काव्यों में मुख्यता: हमें ये दिखाई पड़ता हैं । 

१. प्रेम वेदना की गहनता
२. करुणा की प्रधानता
३. नारी सुलभ सात्विकता
४. महादेवी की आध्यात्मिकता
५. भक्ती की तन्मयता
    भक्ति  के विषय में महादेवी जी के काव्य में आध्यात्मिकता के साथ- साथ भक्ति भाव भी मुखुरित होता हैं।  भक्ति भाव से पूजा अर्चना करने के लिए देव की प्रतिमा के श्रृंगार की सारी सामग्री सजा कर वे पूजा अर्चना में लीन हो जाती हैं। हाँ सामग्री का रूप सामान्य भक्त की सामग्री से भिन्न हैं किन्तु पूजा का भाव वही हैं।

क्या पूजा क्या अर्चन रे ?
उस असीम का सुन्दर मंदिर मेरा लघुतम जीवन रे !
मेरी श्वासें करती रहतीं नित प्रिय का अभिनन्दन रे !!
    

   इस पूजा - अर्चना में पार्थिवता नहीं हैं,किन्तु तन्मयता वही हैं जो एक भक्त में होती हैं इसलिए यह कहा जा सकता है की  महादेवी के काव्य में उपलब्ध वेदना भक्ति की तन्मयता से परिपूर्ण है।

६. विरह वेदना की निरंतरता
                                                      आदि को हम देख सकते हैं ।

महादेवी वर्मा की रहस्य भावना
                      
                        महादेवी वर्मा छायावाद की प्रमुख कवयित्री हैं।   छायावादी कविता की एक प्रमुख विशेषता है उसमें पायी जाने वाली रहस्यवादी भावना  जब कवि उस आज्ञा सत्ता को प्रकृति में सर्वत्र देखता हैं, उससे अपना सम्बन्ध जोड़कर विरह निवेदन व्यक्त करता है और उस अज्ञात प्रियतम से मिलने के लिए छठपठाता है तो इस प्रकार के भावों को व्यक्त करनेवाली कविता को रहस्यवादी कविता कहा जाता है। प्रेम की यह भावना लौकिक ना होकर अलौकिक होती हैं जिसमे जीवात्मा की पीड़ा,वेदना, टीस एवं कसक का वर्णन किया जाता है।
उदा :                                      
                                                        मधुर-मधुर मेरे दीपक जल !
                                              
 युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल
                                             
                                                      प्रियतम का पथ आलौकित कर !!  

महादेवी के काव्य में प्रगीती तत्व को भी हम देख सकते हैं ।
                    गीत में किसी एक विचार ,भाव या घटना  या चित्रण तन्मयता के साथ किया जाता है । इसकी रचना गेय पदों में होती है तथा उसमें भाषा की सुकुमारता विद्यामान रहती है गीतों में प्रायः वय्यक्तिक अनुभूतियाँ अर्थात आत्माभिव्यक्ती रहती है ।
विश्वकोष  के अनुसार --"गति काव्य में विशुद्ध  कलात्मक धरातल पर कवि के अंतर्मुखी जीवन का उदघाटन प्रमुख रूप से होता है और उसमे उसके हर्ष-उल्लास, सुख-दुःख एवं विषाद को वाणी प्रदान की जाती हैं "  भारतीय विचारक डा. श्याम सुन्दरदास ने भी 'प्रगीती' की परिभाषा  में आत्माभिव्यन्जना को प्रमुखता देते हुए कहा है --"गीति काव्य के छोटे-छोटे गेय पदों में मधुर भावानापन्न स्वाभाविक आत्म निवेदन रहता है। इन पदों में शब्द की साधना के  साथ-साथ संगीत के स्वरों का भी उत्कृष्ट साधना रहती है।  इनकी भावना प्रायः कोमल होती है और एक-एक पद में पूर्ण होकर समाप्त हो जाती है। " गीति काव्य में निजीपन के साथ-साथ रागात्मकता का होना अनिवार्य है  डा . दशरथ ओझा के अनुसार" जिस काव्य में एक तथ्य या एक भाव के साथ-साथ एक ही निवेदन, एक हीरास एक ही परिपाटी हो ---वह गीति काव्य है। "

इस विवेचना के आधार पर गीतिकाव्य के तत्व को निरूपित किया जा सकता हैं :
१.आत्मभिव्यन्जकता
२.रागात्मकता
३.काल्पनिकता 
४.संगीतात्मकता
५.भावगत एकरूपता 
६.आकारगत लघुता
७.शैली गत सुकुमारता
  
इतना ही नहीं महादेवी वर्मा की प्रतीक योजनाओं को भी देख सकते हैं ।


महादेवी वर्मा जीजी कविता में वेदना एवं रहस्यवाद की प्रधानता है।   उन्होंने भी अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में प्रतीकों का सहारा लिया है। प्रतीकात्मक भाषा
 का प्रयोग करके महादेवी जी ने एक ओर तो सूक्ष्म भावों एवं व्यापारों को अभिव्यक्त किया है तो दूसरी ओर उसमें कला जा अपूर्व चमत्कार भी समाविष्ट कर दिया है । 

उदा:::            
          प्रिय संध्या गगन मेरा जीवन
यह क्षितिज बना धुंधला विराग 
नव अरुणा अरुणा मेरा सुहाग 
छाया सी काय वीतराग 
सुधि भीने स्वप्न रंगीले घन 

समग्रतः यह कहा जा सकता है कि प्रतीकों का प्रयोग करते हुए महादेवी जी ने अपने काव्य में रमणीयता का विधान किया है।  प्रतीकात्मकता प्रायः सभी छायावादी कवियों की एक प्रमुख काव्यगत विशेषता मानी गयी है।  



                                    जय हिंदी --------जय हिंद !!!
अविस्मरणीय आधुनिक मीरा नारी वादी चेतना का स्वरुप
श्री महादेवी वर्मा को फिर से एक बार हिंदी जगत की तरफ जन्मदिन की शुभकामनाएँ!!!

                             राधाकृष्ण मिरियाला
                   9949707707-9618707707

  हिंदी पखवाड़ा समापन समारोह – एक गरिमामय एवं अविस्मरणीय आयोजन      हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी अभिव्यक्ति, हमारी सांस्कृतिक चेतना...